हाँस्य विनोद आ हार्दिकता – फगुवा के विशेषता

“फागु” भा “होली” हाँस्य विनोद आ हार्दिकता युक्त पर्व हउवे । जे बाल, बृद्ध, युवा, नरनारी सभी वर्ग तह, तप्का समुदाय के हिन्दूजनद्धारा उल्लासमय वातावरण मे हार्दिकता साथ मनावल जाला ।

साथे पुरनका रिस राग द्वेष सब बात के भुलाकर गलामिलत हार्दिकता साथ आपस मे शुभ कामना आदान प्रदान करत खुसी बाँटत मनावल जाला । फागुन पूर्र्णिमा के शुक्ल पक्ष तिथि के दिन मनावल जाएवाला ई महोत्स्व के नाम “होरी” आ फागुन पूर्णिमा भा “फगुवा” भी कहल जाला ।

समदजारा के “होरी” खेलेके कारण भइला से “होरी” कहला त फागुन महिना मे परेवाला उत्सव भइला के कारण आ “फागु” गित गावत नाचत भी ई पर्व उत्सव मनावे के भइला से ई महोत्सव पवनी के “फागु” नाम रहल बात भी जानल बुझल जा सकता ।

रंग, अबिर आपस मे डाल के खेले आ मनावल जाएवाला पर्व फागुन के विशेषता रहल बा । रंग–रंग के उत्सव के रुपमे रहल आ पहिचान बनावल फागु भा होरी के धार्मिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक महत्व भी विशेष ारुप मे रहते आइल बा । “होली” भा “फागु” पर्व मनावे के सम्बन्ध मे प्राचिन ऐतिहासिक धार्मिक कथा विषय प्रसंग भी जुडल रहल बा ।

धार्मिक ग्रन्थ मे उल्लेखित वर्णन मुताविक दैत्यराज हिरण्यकशिपु द्धारा आपन लरीका प्रहलाद जे विष्णु भगवान के परमभक्त रहलें उनका के ईश्वर भक्ति से विभुख होखे आ करे खातिर आपन बहिन होलिका के साथ उनकरे गादीमे रख के आगी मे जराके मारेके लगायत विभिन्न प्रयत्न भइल रहे ।

होलीका के आगी से ना जरेवाला बरदान ईश्वर से मिलल रहे । माकिर खराब आ दुष्ट बिचार से प्रहलाद के मारेके सोंच भइला के कारण ईश्वर कृपा से प्रहलाद के उ आगी से कुछ भी ना भइल । बरु उलटे दुष्ट होलीका उ आगी मे जर के भष्म होगइली । भगवान विष्णु नृसिंह (जरसिंह) अवतार लेके दुष्ट हिरण्यकशिपु के भी बध कइनी । जेसे सारा दुनिया मे खुसी आउरी अमन चयन स्थापित भइल ।

एहितरे दोसर कथा धार्मिक प्रसंग वर्णन मुताविक कृष्ण के मामा कंश द्धारा आपन भगिना भगवान बाल श्री कृण के मारे खातिर पुतना नामक राक्षसीद्धारा मारेके योजना मुताविक पुतना के विष युक्त स्तन मे स्तनपान करावल गइल । माकिर श्री कृष्ण द्धारा स्तनपान के माध्यम से दुष्टिन राक्षसी पुतना के बध कइनी । पुतना के बध भइल आ भगवान बाल श्री कृष्ण के कउनो जोखिम ना भइल ।

अतः खुसि मनावत सारा दुनिया जन द्धारा रंग अबिर एक आपस मे लगावत होली के खेलेके भइला से इहे उपपरोक्त बमोजिम पौराणीक युग से होली खेलेके मनावे के परम्परा रहते आइल बा ।

धार्मिक पौराणीक महत्व के सांस्कृतिक उत्सव होली मे आपस मे रंग अबिर लगा के मनोरञ्जन करत खुसी मनावे के बात पर्व उत्सव मे स्वभाविक हि हउवे । आत्मियता भैत्रिसदभाव, रंग के उत्सव होली से आदान प्रदान होखही के चाहिं ।

जे होली कहल ही रंग के उत्सव ह । माकिर खानपिन आ मनोरञ्जन के नाम मे होली मे जथाभावी ज्यादा आउरी गरिष्ट भोजन आ चरस भाँग धतुर गाँजा अफिम, दारु जइसन देह आ स्वास्थ्य मे असर करेवाला बस्तु ना खाए पिए क चाहिं । साथे ठिक मात्रा मे खानपिन करेके चाहिं ।

अन्यथा ओइसन खान पिन से बेहोसी होत सामाजिक विकार, झै झगडा, मारपिट, बिकृति, सवारी चलावत दुर्घटना, स्वास्थ्य मे हानी नोक्सानी साथे धनजन के क्षती भी पहुँच सकेला । अतः ई सब बात उपर ध्यान देत आउरी सतर्कता अपनावत स्वास्थ रहत, स्वास्थ्य मनोरञ्जन सहित शान्तिपूर्ण रहत, खुसी मनावत होली खेलत आनन्द साथ रहेके चाहिं । जेसे पाछा पछुताव भा दुःख ना होखो ।

आज समाज मे होली खेलेके नाम मे बहुते विकृति बढ रहल बात आम जनसमाज मे से अनुभव आ महसुस होते आ रहल बा । जे विकृति युक्त बात ना होखेके चाहिं । सभ्य समाज के सृजना मे हमनी सबजन से आवश्यक सहजोग होखेके चाहिं । “होली” असत्य उपर सत्य के बिजय उत्सव हउवे त आसुरी प्रवृति उपर दैवी शक्ति के बिजय उत्सव के रुप ह ।

ईहवाँ बुझे जानेवाला बात ई बा की, “होलीका दहन” के मतलब मनके भितर उब्जे रहेवाला होलीका आ पुतना रुपी खराब भा दुषित तत्व आ गलत सोंच बिचार के मनके भितर से हटावत मिटावत सुबिचार जागृत करावत, जनहित के कार्ज मे सबदिन जुटत, लागत रहेके चाहिं कहे खातिर रहल बात हउवे । रंग मन के आनन्दित आ मोहित करेला ।

फगुवा मे लाल, पियर, उजर, हरियर लगायत विभिन्न रंग से होली खेलल जाला । एमे भी आन्तरिक अर्थ भाव रहे के साथे साथ उ रंग सब के आपन विशेष महत्व रहल बा । लाल रंग शुभ सौभाग्य आ बिरता के प्रतिक हउवे । साथे उजर रंग शान्ति आ शुद्धता के धोतक हउवे त हरियर रंग प्रगति आ समृद्धि प्रदायक के प्रतिक हउवे । ओहितरे सब रंग के महत्व रहल बा ।

माकिर कउनो भी चिज बस्तु सामान के गलत प्रयोग आ मात्रा से बेसी प्रयोग भा उपभोग कइला पर ओसे उलटे खराबी होला । ओहिसे फगुवा मे होरी खेलत बेरी विभिन्न रंग के प्रयोग करत उचित मात्रा मे सहित जगह आ सहि चिज ही प्रयोग कके फगुवा खेलेके चाहिं ।

साथे साथ ओइसन रंग मे विभिन्न हानिकारक रसायन भी मिलावल रहेके कारण यदि ओइनस रंग अबिर आँख, कान जइसन संवेदनशिल अंग मे परला पर जेसे विभिन्न अंग मे खराबी होखेके साथे आन्हर, बहिर भी हो सकेला । अतः गाँजा, भाँग, धतुर, अफिम जइसन नशायुक्त पदार्थ फगुवा के नाम पर फगुवा ह कहत ना खाए पिएके चाहिं । साथे फगुवा मे डिजल, मोबिल, पेन्ट, ईनामेल जइसन हानिकारक पदार्थ केहु के भी आँख, कान लगायत मुह आदि मे ना लगावे देवेके चाहिं ।

जे विविध कारण से होस शुन्य आउरी अनेकन बेमारी होखेके बात भी विज्ञलोग के कहनाम रहेके साथे ओइसन देखल कहल आ अनुभव रहल लोग के सुनल बात से भी जानकारी होखेमे आवेला ।

होली के मतलब होली के विभिन्न रंग लेखा जीनगी के रंगीन आउरी आनन्द दायक बनावत, सबदिन खुसी रहत, हाँस्य विनोद साथ विनोदी बनत बनावत रोस राग त्याग करत आपसी सदभाव आ मैत्री एकता साथ शान्तिपूर्ण रहके ओइसन पर्व उत्सव खुसी साथ मनावे के चाहिं कहत होलीके शन्देश रहल मिलेला ।

छोट, बढ, धनी, गरिब लगायत सम्पूर्ण वर्ग समुदाय के लोग के बिच समन्वय करे करावेवाला साथे उत्साह आ उमंग के अनुभुति करावत जन जन मे आनन्द प्रदान करेवाला उत्सव ह “होली” । होली पर्व उत्सव के पावन अवसर मे सम्पूर्ण जनमे हार्दिक मंगलमय शुभ कामना ।
– वीरगंज–१२, मुर्ली बगैचा

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