ऐनुल बरौलवी के “आँखिन-भादो मास” (भोजपुरी गजल-संग्रह) के समीक्षा

देख लीं सौगात ई, आँखिन भादो-मास।
रोज़े बा बरसात ई, आँखिन भादो-मास ll

गोपालगंज , बिहार (भारत) के शायर ऐनुल बरौलवी के पहिलका गजल संग्रह ‘आँखिन-भादो मास’ पढ़े के मिलल ह. एक से एक गजल, आ तरह-तरह के विषय पर कई तरह के गजल! १५२ पेज के संग्रह में कुल ११६ गो गजल जवना में ३२ पेज के भूमिका में शायर सहित पांच लोग के गजलकारी विचार! सब के सब पढ़े-गुने लाएक!

अपना मतारी के समर्पित एह संग्रह में ऐनुल जी के लोराइल आँख मातृ भाषा भोजपुरी आ मातृभूमि के अंचरा गीला करत लउकता-
आपन खुद पहचान बनाईं
भोजपुरी के शान बनाईं l
माई भाषा बोल के रउआ
हर पल देश महान बनाईं ll

किताब के नांव पढ़ के एगो फ़िल्मी गीत इयाद पर गइल-“उन आँखों का हंसना भी क्या, जिन आँखों में पानी नहीं…!” लोराइल आँख में जवन सुनराई बसेला, ऊ कजराईल में ना लउकी, काहें कि लोर प्रकृति के बनावल हृदय के उद्गार ह आ काजर अदिमी के बनावल बिकाऊ चीज ह. सावन-भादो प्रकृति के ऊ महीना ह जवना में आकाश आ धरती में मिलाप होला. साल भर के विछोह से भरल आसमान के आँख जब बरसेला तब धरती के छाती जुड़ाला. इहे असली गजल ह जवना के अरबी में दूगो मन के आत्मीय संवाद के शैली कहल गइल बा. सूरदास के आत्मा परमात्मा के विछोह में रोवत-गावत कहतिया–“निसि दिन बरसत नैन हमारे! एहिजा गोपी लोग त खाली देखावटी बहाना बाड़ी!

सब लिखल साहित्य ना होखेला. साहित्य खातिर संवेदना जरुरी होला. ई संवेदना ऐनुल में बहुते बा! देश-दुनिया के विकृत रूप देख के एह शायर के मन बहुते घवाहिल लउकता–
चान आइल ना दुआरा का करीं
आँख से फेनू इशारा का करीं l
देख लीं टटका हिया के घाव बा
हम दरद से अब किनारा का करीं ll

भूमिका में गजल के रंग-रूप आ आकार-प्रकार पर जौहर शाफियाबादी जी के विचार पढ़ के केहू भी अनजान पाठक गजल के मरम के आसानी से समझ लिही. एही तरे वीरेंदर नारायण जी, ध्रुव गुप्त, शाफिया हसन आ गोपाल अश्क जी के गजलकारी भूमिका-संदेश में संग्रह के साहित्यिक रहस्य साफ हो जा रहल बा.

अपना वास्तविक रोजगारी जीवन में ट्रेन के सही पटरी के राह देखावे वाला शायर के एह गजलन में इंसान के जिनिगी सही ठेकान पर पहुंचावे के मरम समुझावे वाला बा. कुछ गजल त लइकन के पढ़ावे लाएक बाड़ी सन!

केबीएस प्रकाशन दिल्ली से आईएसबीएन के साथ छपल ई किताब बहुते आकर्षक आ प्रूफ शोधित बा. महंगाई के एह जबाना में डबल बॉन्डिंग के एह किताब के दाम २०० रोपेया कवनो ज्यादा नइखे लागत. भोजपुरी किताबन के कीन के पढ़े के आदत बनावल जरुरी बा !

किताब के अंत कतना दरद से होता, देखल जाव तनी–
मिलल जे प्रेम में पत्थर, बहल बा खून के धारा
नदी के धार जइसन रात-दिन, हमहुँ बहल बानी l
जमाना बहुते कांटा रोज़ ‘ऐनुल’ जी चुभवले बा
बताईं का सभे से हम, दरद कतना सहल बानी ll

प्रो० (डाॅ०)शंकर मुनि राय ‘गड़बड़’
राजनांदगांव , छत्तीसगढ़ (भारत)

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