पर्सा, बारा लगायत के जगहा मे धुमधाम के साथ राखी पर्व मनावल गईल

अजय कु. चौरसिया
वीरगंज १४ भादो
पर्सा, बारा सहित देशभर आजु ‘राखी’ पर्व मनावल गईल बा । चन्द्रमास के सावन पूर्णिमा के दिन दिदीबहिन आपन भाई, भैया के सौर्य वृद्धि के कामना करत दाहिने हाथ के कलाई मे रक्षासूत्र (डोरा, धागो) बान्हेके परम्परा के तराई मधेश मे ‘राखी’ कहल जाला ।
सामान्यतया सौरमास के भी सावन मे परेवाला ई पर्व ई पालि सावनभर अधिकमास (मलमास) परला से ई बरीस पछाडि धकेलाके करिब मध्य भादो मे परल बा । पर्व के खातिर दाजुभाइ तथा दिदीबहिन के तईयारी से सभी ओरी आजु राखीमय बनल रहे । दु÷तीन दिन पहिले से रङ्गीचङ्गी ‘राखी’ (अनेकन रङ के धागा के डोरा) जहाँतहाँ बेंचे खातिर राखल गईल बा । दोकान मे आपन दाजुभाइ के खातिर अनेकन रङ्ग के रक्षासूत्र (राखी) किने खातिर बस्ती के चोकचोक मे भिड हि देखल गईल रहे । राख सँगे दाजुभाइ के खियावे खातिर मिष्टान्न परिकार के व्यवस्था मे लागला से मिठाइ दोकान भी ग्राहक से भरल रहे ।
पर्व के खातिर दिदीबहिन से राखी बन्हावे खातिर दुर दुर मे रहल भाई, भैयालोग घर आईल बाडन । ई पर्व वियाह भईल दिदीबहिन आपन घर भा नईहर मे सुविधा मुताविक मनावेलन । अविवाहित चेली के त दाजुभाइ के घर आपन भईला से घर मे पर्व के तइयारी मे किशोरीसब व्यस्त रहलन । छोट लईकीसब के खातिर पर्व के तइयारी मे घर के गारजियन सहजोग करेलन ।
तराई मधेश मे आजु दाजुभाइ÷दिदीबहिन बीच प्रेम, सद्भाव आ एक दोसर उपर के समर्पण भाव झल्केवाला गीत बाजत रहे । सभी ओरी राखी पर्व के रमझम आ तईयारी से आजु बजार मे चहलपहल बढल रहे ।
पर्व मे दिदीबहिन राखी बान्हला पर मिष्टान्न परिकार खिअईला के बाद दाजुभाइ वस्त्रआभुषण आ नगद दक्षिणा देवेलन । हिन्दू परम्परा के रक्षाबन्धन पर्व के एक अङ्ग के रुप मे राखी स्थापित भईल बुद्धिजीवीलोग के कहनाम बा । रक्षाबन्धन पर्व मे गुरुपुरोहित अभिमन्त्रित डोरा शिष्य आ यजमान के बान्हेके चलन भी रहल बा । ं
सत्ययुग मे तीनु लोक (स्वर्ग, मत्र्य आ पाताल) के अधिपति रहल दानवराज वलि के उनकर गुरु शुक्राचार्य देवता सँगे के युद्ध मे जाए से पहिले शास्त्रोक्त विधि से अभिमन्त्रित कईल डोरा (रक्षाकवच, रक्षासूत्र) बान्हल विश्वास के परम्परा मे पुरोहित से डोरा बान्हेके चलन बा । ओकरा सँगे जुडल दोसर प्रसङ्ग मे वलि के बहिन गङ्गा आ यमुना युद्ध मे जाए से पहिले विजय के कामना करत हाथ मे रक्षाबन्धन (रक्षाकवच) बान्हल आ उ युद्ध मे वलि के जित भईल सम्झना मे हरेक बरीस के सावन पूर्णिमा के दिन दिदीबहिन आपन दाजुभाइ के सौर्य वृद्धि के कामना करत राखी बान्हेके परम्परा सुरु भईल किवदन्ती बा ।
राखी पर्व सभी जातजाति, सम्प्रदाय आ धर्मावलम्बी मनावेलन । पिछिलका दशक मे अत्याधुनिक सूचना आ सञ्चार प्रविधि के विकास से फरक फरक परम्परा के समुदाय एकाकार बनत पर्व साझारुप मे मनावे लागल वीरगंज–१५ के सुबास मिश्रा बतवनी । ई पर्व आपसी हेलमेल आ सामाजिक, सांस्कृतिक सद्भाव के अपूर्व नमूना बनल बतावल जा रहल बा ।






