नेपाल के राजनीति में क्षेत्रीय आ सामाजिक असंतुलन

नेपाल के राजनीति में क्षेत्रीय आ सामाजिक असंतुलन

– प्रो. रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’

प्रोफेसर , नव नालंदा महाविहार ,नालंदा
(सम विश्वविद्यालय, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार )

।। एक ।।

नेपाल के राजनीतिक, सामाजिक आ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ई बात बहुत जरूरी बा कि देश के शासन आ सत्ता व्यवस्था पर मुख्य रूप से पहाड़ी नेता लोग के वर्चस्व रहल बा, खासकर पहाड़ी ब्राह्मण लोग के। एकरा के गहराई से नीचे के तरह से समझल जा सकेला:

नेपाल के स्थापना 18वीं सदी में गोर्खा साम्राज्य के समय भइल रहे। ओह समय के शासक आ प्रशासनिक व्यवस्था में नेपाली पहाड़ी ब्राह्मण आ छेत्री समुदाय के प्रमुख स्थान रहल। एह लोग के शिक्षा, धर्म, प्रशासन आ राजनीतिक नेतृत्व में एगो खास दर्जा मिलल रहे। हिमालयी क्षेत्र (पहाड़ी क्षेत्र) के लोग ब्राह्मण आ छेत्री जाति में सामाजिक, धार्मिक आ प्रशासनिक रूप से महत्वपूर्ण मानल जात रहे। ई परंपरा सत्ता के केंद्रीकरण के जन्म दिहलस।

नेपाल के सरकारी संस्थान आ राजनीतिक दलन में मुख्य रूप से पहाड़ी ब्राह्मण आ छेत्री के प्रभुत्व रहल। चाहे राजतंत्र होखे, संसदीय व्यवस्था होखे, या सामूहिक राजनीतिक आन्दोलन होखे—मधेसी समुदाय के प्रतिनिधित्व बहुते सीमित रहल। मधेसी क्षेत्र, जे नेपाल के तराई इलाका ह, जनसंख्या के हिसाब से बहुत संवेदनशील आ जरूरी बा। लेकिन सामाजिक संरचना, जातीयता आ सांस्कृतिक भेदभाव के कारण ई लोग राजनीतिक रूप से उपेक्षित बनल रहल।

मधेसी समुदाय मुख्य रूप से खेती-बारी आ व्यापार से जुड़ल रहल, जबकि ब्राह्मण आ छेत्री वर्ग शिक्षा, प्रशासन आ सत्ता के संरचना में केंद्रित रहल। शिक्षा, प्रशासनिक पद आ राजनीतिक निर्णय में मधेसी समुदाय के हिस्सा बहुत कम रहल। फलस्वरूप, सामाजिक असमानता आ क्षेत्रीय असंतुलन दिन पर दिन बढ़त गइल। मधेसी जनता के बार-बार अपना राजनीतिक अधिकार आ सामाजिक पहचान खातिर संघर्ष करे के पड़ल।

2007 में भइल मधेसी आन्दोलन देश के राजनीतिक परिदृश्य के हिला देहलस। ई आन्दोलन मुख्य रूप से मधेसी समुदाय के न्यायिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक अधिकार खातिर लड़ाई रहल। आन्दोलन ई सवाल उठवलस कि देश के संविधान आ राजनीतिक व्यवस्था मधेसी जनता के अपेक्षित प्रतिनिधित्व आ अधिकार के अनदेखी करत बा। आन्दोलन के मुख्य माँग रहल—क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, समान नागरिकता, आ स्थानीय प्रशासन में भागीदारी।

पहाड़ी ब्राह्मण लोग के वर्चस्व असंतुलन के कारण बनल, जेसे मधेसी जनता में असंतोष आ अलगाव के भावना बढ़ल। ई असंतुलन सामाजिक विभाजन, क्षेत्रीय अवमानना आ राजनीतिक विद्रोह के रूप ले लिहलस। जेसे राजनीतिक अस्थिरता, हिंसात्मक प्रदर्शन आ सामाजिक तनाव के स्थिति बनल। समावेशी लोकतंत्र आ संवैधानिक सुधार के जरूरत पर जोर मिलल।

आज के समय में नेपाल संवैधानिक रूप से संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बन चुकल बा, जवना में समावेशी प्रतिनिधित्व के बढ़ावा देवे के कोशिश हो रहल बा। मधेसी समुदाय के प्रतिनिधित्व खातिर संवैधानिक प्रावधान आ आरक्षण प्रणाली लागू कइल गइल बा, बाकिर व्यवहार में अभी भी कई प्रकार के कठिनाई मौजूद बा—राजनीतिक दल में प्रतिनिधित्व के असमान वितरण, सामाजिक भेदभाव आ क्षेत्रीय असंतुलन के समस्या।

नेपाल के पहाड़ी ब्राह्मण आ छेत्री के वर्चस्व ऐतिहासिक, सामाजिक आ राजनीतिक कारण से उत्पन्न बा। ई एगो गहिर असंतुलन ह, जे मधेसी समुदाय के राजनीतिक, सामाजिक आ आर्थिक अधिकार के हाशिए पर रखलस। मधेसी आन्दोलन ई असंतुलन के उजागर कइलस आ समावेशी लोकतंत्र के दिशा में आगू बढ़े के प्रेरणा दिहलस। भविष्य में सशक्त लोकतांत्रिक व्यवस्था बनावे खातिर जरूरी बा कि सभे समुदाय के समान अवसर, समान प्रतिनिधित्व आ समान अधिकार मिलल करी।

।। दू ।।

नेपाल के ऐतिहासिक विकास में ब्राह्मण आ छेत्री जाति के प्रधानता एगो विशेष सामाजिक व्यवस्था से जुड़ल बा। प्राचीन समय से ई लोग शिक्षा, धर्माचार्य आ प्रशासनिक पद में खास रहल। ई संरचना एतना मजबूत बन गइल रहे कि ब्राह्मण के सर्वोच्च मानल जाल। ओह समय से राजनीतिक सत्ता एह जाति के हाथ में केंद्रित हो गइल। पहिले राजा आ ओकर दरबार में भी मुख्य रूप से ब्राह्मण आ छेत्री के लोग काम करत रहल। ई स्थिति सामाजिक स्वीकृति के साथ-साथ ऐतिहासिक अधिकार बन चुकल रहे।

मधेसी समुदाय, जे नेपाल के तराई इलाका में बसल बा, एक अलग पहिचान वाला समूह ह। उनकर भाषा, संस्कृति आ परंपरा हिमाली पहाड़ी जाति से बिलकुल अलग बा, लेकिन सत्ता के केंद्रीकरण आ सामाजिक पहचान के बल पर उनकर राजनीतिक रूप से हाशिया पर राखल गइल। समाजिक असमानता उनकरा के संघर्षशील बना देहलस।

नेपाल के राजनीतिक इतिहास में ई देखल गइल कि संवैधानिक संस्थान आ राजनीतिक दलन में पहाड़ी ब्राह्मण आ छेत्री के प्रभाव बहुते जादे रहल। नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी आ अन्य प्रमुख दल में भी ई जाति के प्रभुत्व रहे। मधेसी नेता लोग के राजनीतिक निर्णय लेवे वाला सर्वोच्च पद पर जाए के मौका बहुत कम मिलल। संसद, मंत्रिपरिषद आ प्रशासनिक सेवा में मधेसी समुदाय के हिस्सा न के बराबर रहल।

नेपाल के संविधान, खासकर 1990 आ 2015 के संविधान, मधेसी समुदाय के राजनीतिक भागीदारी आ अधिकार के मान्यता देवे के कोसिस कइलस। बाकिर व्यवहार में ई व्यवस्था अबहियों पूरा लागू ना भइल। राजनीतिक दल अक्सर मधेसी नेता लोग के सम्मानजनक लेकिन असरहीन पद पर राखलस। सत्ता के ढांचा में बदलाव के गुंजाइश रह गइल।

मधेसी समुदाय के मुख्य व्यवसाय खेती-बारी, छोट व्यवसाय आ स्थानीय व्यापार रहल। ब्राह्मण आ छेत्री लोग प्रशासनिक, शैक्षणिक आ धार्मिक काम में जादे लागल रहल। शिक्षा में भी असमानता साफ देखाई देहलस। बेहतर शिक्षा आ प्रशासनिक नेटवर्क के चलते ब्राह्मण-छेत्री वर्ग जादे सशक्त बनल, जबकि मधेसी समुदाय के लगे सीमित संसाधन आ अवसर रहल।

आर्थिक रूप से भी तराई क्षेत्र के अविकसित स्थिति आ शासन के उपेक्षा मधेसी समुदाय के कमजोर बनवलस। बैंक, बड़े उद्योग आ सरकारी परियोजना मुख्य रूप से पहाड़ी इलाका में केन्द्रित रहल। मधेसी लोग के सामाजिक सेवा, स्वास्थ्य सुविधा आ शिक्षा में पूरा समता ना मिलल। एह से मधेसी जनसंख्या के पिछड़ापन बनल रहल।

2007 के बाद मधेसी आन्दोलन ना सिर्फ स्थानीय, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के भी बदल देहलस। ई आन्दोलन सत्ता के केंद्रीकरण, नागरिकता नीति, क्षेत्रीय अधिकार आ सामाजिक पहचान के लेकर रहल। आन्दोलन के मुख्य माँग में समानता के अधिकार, संवैधानिक बदलाव आ मधेसी नेता लोग के महत्त्वपूर्ण पद पर पहुँचावे के माँग शामिल रहल।

आन्दोलन नेपाल के एगो नया संवैधानिक युग में ले गइल। 2015 के संविधान संघीयता के स्थापित कइलस, ताकि क्षेत्रीय अधिकार आ समावेशिता सुनिश्चित हो सके। मधेसी समुदाय के प्रतिनिधित्व खातिर आरक्षण व्यवस्था लागू भइल। लेकिन संवैधानिक संशोधन के पहाड़ी ब्राह्मण आ छेत्री नेतृत्व अपने-अपने स्वार्थ अनुसार कमजोर करे के कोशिश भी कइलस।

एह आन्दोलन से ई बात साफ हो गइल कि असंतुलन खाली जातीय समस्या ना ह, बल्कि ई राजनीतिक अधिकार, नागरिकता, सामाजिक पहचान आ आर्थिक समावेशन के मामला ह। आन्दोलन पूरा नेपाल के ई सोचावे पर मजबूर कइलस कि लोकतंत्र तब सशक्त होई जब हर क्षेत्र आ समुदाय के समान अवसर मिलल करी।

आजो मधेसी प्रतिनिधित्व के स्थिति अधूरा बा। संवैधानिक प्रावधान के बावजूद व्यवहारिक कठिनाई बरकरार बा। प्रशासनिक सेवा में पद पर पहुँचला, चुनावी क्षेत्र में निष्पक्ष प्रतिनिधित्व आ नीति निर्धारण में समावेशिता के दिशा में कई चुनौतियाँ अभी बाकी बा।

राजनीतिक दल के भीतर मधेसी नेता लोग के भूमिका अक्सर सीमित रहल। सामूहिक रूप से मधेसी नेतृत्व के क्षमता आ राजनीतिक एकता भी कमजोर मानल जाला, जेसे ऊ लोग प्रभावी ढंग से अपना माँग के आगू ना बढ़ा पावत। सामाजिक स्तर पर भी मधेसी जाति के भेदभाव, क्षेत्रीय पूर्वाग्रह आ सांस्कृतिक अवमानना के सामना करे के पड़ेला।

फिर भी संघीय लोकतांत्रिक व्यवस्था उम्मीद के नया द्वार खोलत बा। मधेसी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, नागरिक अधिकार आ आर्थिक अवसर देवे खातिर संवैधानिक उपाय आ व्यवहारिक सुधार जरूरी बा। शिक्षा के विस्तार, सामाजिक समावेशन के कार्यक्रम आ न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व बढ़ावे से ई असंतुलन धीरे-धीरे खतम हो सकेला।

नेपाल में पहाड़ी ब्राह्मण के वर्चस्व खाली ऐतिहासिक संरचना के परिणाम नइखे, बल्कि ई सामाजिक, राजनीतिक आ आर्थिक पक्ष से बनल असंतुलन के नतीजा ह। मधेसी समुदाय के अपेक्षित सहभागिता आ प्रतिनिधित्व आजो अधूरा बा। मधेसी आन्दोलन ई बात साफ कइलस कि लोकतंत्र तबही सशक्त होई जब सभे समुदाय के बराबर के अधिकार, अवसर आ पहिचान मिले।

भविष्य के राह समावेशी संवैधानिक सुधार, सामाजिक न्याय, शिक्षा के सशक्तिकरण आ राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मजबूत उपाय में बा। नेपाल के एगो सशक्त, समावेशी आ संतुलित लोकतंत्र बनावे खातिर ई असंतुलन दूर करे के जरूरी बा।

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