परिचय दास के खजुराहो महोत्सव में व्याख्यान

परिचय दास के खजुराहो महोत्सव में व्याख्यान

खजुराहो मंदिर समूह के मध्याह्न बेला में जब पत्थर पर उकेरल नृत्य-मुद्रा सभे धूप के सोना जइसन कण के आपन देह पर समेटत रहली, ओही अलौकिक घड़ी में शब्द आ संगीत पर एगो गंभीर संवाद के जनम होत रहे। शिला पर जड़ावल आकृति सभ जइसे समय के लय के थाम लेले होखसु, ओइसहीं सभागार में बइठल श्रोता लोग के चेतना एकाग्र होके सुनत रहे—शब्द के ऊ यात्रा, जे ध्वनि से चल के अर्थ तक, आ अर्थ से बढ़ के अनुभव तक पहुँचेला।

नव नालंदा महाविहार के हिंदी विभाग के प्रोफेसर रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” जब खजुराहो महोत्सव के मंच पर बोलल शुरू कइलन, त उनकर विषय रहे—“शब्द आ संगीत: फिलिम आ दोसरा माध्यमन में अर्थ-निर्माण के प्रक्रिया।” ई खाली अकादमिक बात ना रहे; ई संस्कृति के भीतरी रहस्य के धीरे-धीरे खोलत एगो साधना जइसन रहे।

उ कहनी कि शब्द जब अकेले रहेला, त बस अर्थ के एगो सीधा रेखा जइसन होखेला। बाकिर जइसे ही ऊ संगीत से जुड़े ला, ऊ रेखा घेर बन जाला—बहुआयामी, गत्यात्मकता से भरल, आ अनुभव-संपन्न। शब्दकोश में दर्ज शब्द अपना अर्थ के स्थिर छाया रखेला; लेकिन जब ऊ राग, लय, ताल आ विराम के संग आवेला, त ऊ जिंदा हो जाला। फिलिम में बोले गइल “प्रेम” शब्द तब खाली प्रेम ना रहेला; ओकर आरोह-अवरोह, पाछे बजे वाली धुन, कैमरा के कोण—सब मिल के ओकरा में नया अर्थ भर देला।

परिचय दास कहनी कि संगीत शब्द के दोसरा देह देला। शब्द के ध्वन्यात्मक देह त पहिले से होला—वर्ण, उच्चारण, लय के। बाकिर संगीत ओकरा में भाव के देह भी जोड़ देला। जब गीत फिलिम में आवेला, त ऊ कथा के रोके ना; ऊ कथा के भीतर एगो भीतरी खिड़की खोल देला। संवाद जहाँ तर्क से बात करेला, गीत सीधे संवेदना से संवाद करेला।

उ भारतीय सिनेमा के परंपरा के याद करत कहनी कि गीत इहाँ मनोरंजन भर ना रहल; ई कथा-निर्माण के आत्मा रहल। कविता आ संगीत मिल के सामूहिक स्मृति रचले बा। कवनो पुरान गीत सुने के साथे आदमी आपन बीतल समय में लउट जाला। अर्थ खाली परदा पर ना बनत, ऊ स्मृति में बार-बार पुनर्रचित होत रहेला।

उ मौन के महत्त्व पर भी जोर देनी। कई बेर शब्द चुप रहेला, संगीत बोले लागेला। कई बेर संगीत भी चुप हो जाला, बाकिर ठहराव अपना आप में अर्थ के संकेत बन जाला। ई ठहराव ऊ जगह ह, जहाँ दर्शक अपना अनुभव जोड़ेला। एह तरह अर्थ-निर्माण एकतरफा ना होखे; ई रचनाकार, माध्यम आ दर्शक—तीनों के साझी रचना ह।

उ उदाहरण देके समझवनी—मान लीं बरखा हो रहल बा, पाछे मंद्र बांसुरी बजे ला, आ पात्र बस एतना कहेला—“जइब।” ई “जइब” विदाई भी हो सकेला, विरक्ति भी, नया शुरुआत के आहट भी। संगीत ओकरा में भाव-परिवेश रचेला, दृश्य संदर्भ देला, आ शब्द अर्थ के बीज डालेला।

डिजिटल समय के चर्चा करत उ कहनी कि अब वेब-सीरीज़, लघु फिलिम आ सोशल मीडिया के दौर में शब्द आ संगीत के रिश्ता अउरी जटिल हो गइल बा। समय कम बा, ध्यान अल्पकालिक बा, लेकिन छोट पंक्ति आ हल्की धुन भी गहिर अर्थ रच सकेली। शर्त बस ई बा कि संतुलन बनल रहे। जब संगीत हावी हो जाला त शब्द दब जाला; जब शब्द अत्यधिक घोषणात्मक हो जाला त संगीत के भाव-भूमि सिकुड़ जाला। कला के असली रचनात्मकता एह संतुलन में बसल बा।

प्रश्नोत्तर में जब पूछल गइल कि का संगीत शब्द से बेसी प्रभावशाली हो सकेला, त उ मुस्की मार के कहनी—तुलना प्रभाव के स्तर पर हो सकेला, बाकिर रचना में दुनो परस्पर निर्भर बा। शब्द संकेत देला, संगीत ओह संकेत के अनुभूति में बदल देला। ई प्रतिस्पर्धा ना, सह-रचना ह।

खजुराहो के ऐतिहासिक धरती पर ई विमर्श अउरी गहिर हो उठल। जवन जगह पर पत्थर में लय स्थिर बा, ओही जगह शब्द आ संगीत के लय पर संवाद होत रहे। जइसे मंदिर के दीवार पर नृत्य-मुद्रा समय के रोक लेले बा, ओइसहीं फिलिम आ अन्य माध्यम शब्द के भीतर लय के जिंदा रखेला।

अंत में सभागार में एगो गाढ़ एकाग्रता पसरेल रहे। लागे लागल कि शब्द अपना यात्रा पूरा क लेले—ध्वनि से अर्थ, आ अर्थ से अनुभव तक। उ दिन खाली एगो व्याख्यान ना रहल; ऊ शब्द, संगीत आ दृश्य के मिलल क्षण रहे—जवन देर तक स्मृति में गूंजत रही।

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