खजुराहो महोत्सव में भोजपुरी चित्रकार वंदना श्रीवास्तव के दू गो किताब के लोकार्पण
खजुराहो महोत्सव में भोजपुरी चित्रकार वंदना श्रीवास्तव के दू गो किताब के लोकार्पण

खजुराहो महोत्सव के दोसरा दिन आयोजित ‘कलावार्ता’ कार्यक्रम में एगो महत्त्वपूर्ण साहित्यिक अउर कलात्मक घड़ी दर्ज भइल। प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” के व्याख्यान के बाद भोजपुरी के प्रतिष्ठित चित्रकार वंदना श्रीवास्तव के दू गो किताब — “कला का सामाजिक व्याकरण” अउर “भोजपुरी कला के बहाने” — के विधिवत लोकार्पण कइल गइल।
वंदना श्रीवास्तव भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सीनियर फेलो हईं। ऊ दिल्ली सरकार के साहित्य कला परिषद के सदस्या, केंद्रीय विद्यालय, द्वारका, नई दिल्ली के प्रबंधन समिति के सदस्या आ “आम्रपाली” पत्रिका के सलाहकार संपादको हईं। भोजपुरी कला आ संस्कृति के क्षेत्र में उनकर सक्रिय उपस्थिति विशेष रूप से मानल जाला।
पुस्तक-लोकार्पण समारोह में मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति मंत्रालय के उस्ताद अलाउद्दीन खान संगीत अउर कला अकादमी के निदेशक श्री प्रकाश सिंह ठाकुर, उपनिदेशक श्री शेखर कराडकर, सुश्री रजनी राव, सुश्री शैलजा सुल्लेरे, प्रो. परिचय दास आदि मंचासीन रहलें। सभे अतिथि मिलके किताबन के विमोचन कइलन आ लेखिका के रचनात्मक अवदान के सराहना कइलन।
ए अवसर पर वक्ता लोग कहलन कि “कला का सामाजिक व्याकरण” खाली चित्रकला के तकनीकी पक्ष पर बात ना करेले, बलुक कला के भीतर बसल संवेदना, रूपबंध अउर सांस्कृतिक संदर्भन के गहराई से खोले के कोशिश करेले। वोहीं “भोजपुरी कला के बहाने” क्षेत्रीय कला-चेतना के व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य में रखके देखे के गंभीर प्रयास ह।
ई किताब भोजपुरी लोक-अनुभव, रंग-संवेदना आ दृश्य-भाषा के विशिष्टता के आलोचनात्मक नजरिया से प्रस्तुत करेले। वक्ता लोग खास तौर पर ई रेखांकित कइलस कि आज जब दृश्य माध्यमन के बहुलता बा, तब गंभीर कला-चिंतन के कमी साफ महसूस होला। अइसन समय में वंदना श्रीवास्तव के ई कृति सभ संवाद अउर विमर्श के नया संभावना खोले वाली साबित हो सकेली।
निदेशक श्री प्रकाश सिंह ठाकुर कहलन कि क्षेत्रीय कला के सही अर्थ में समझे खातिर ओकर सामाजिक आ सांस्कृतिक आधार के पढ़ल जरूरी बा। उनकर मत रहे कि वंदना श्रीवास्तव के काम भोजपुरी कला-संवेदना के रचनात्मक अभिव्यक्ति ह, जे परंपरा आ आधुनिकता के बीच एगो मजबूत सेतु बनावे के काम करेले।
कार्यक्रम में मौजूद कलाकार, शोधार्थी अउर कला-प्रेमी लोग किताबन के हार्दिक स्वागत कइलस। खजुराहो के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक धरती पर सम्पन्न ई लोकार्पण समारोह कला आ साहित्य के आपसी संबंध के जिंदा उदाहरण बन गइल।






