भोजपुरी सुगद / वसंत पंचमी रंग~वसंत आ देह, स्मृति एवं फागुन के लय
भोजपुरी सुगद / वसंत पंचमी रंग~वसंत आ देह, स्मृति एवं फागुन के लय

बसंत पंचमी आवते हवा के चाल बदल जाले। ई बदलाव अचानक ना होखेला, ई त धीरे-धीरे देह में उतर जाला। सरदी अब चुभे वाली ना रह जाले, ऊ बस छुअन बन के रह जाले। सूरज के रोशनी में एक नयापन आ जाले—जइसे ऊ आँख से पहिले मन पर पड़त होखे। बसंत पंचमी कोई एक दिन ना, ई मौसम के दरवाजा ह, जहाँ से फागुन के यात्रा शुरू हो जाले।
बसंत पंचमी के पीयर रंग धरती पर पसर जाले। सरसों के खेत अब खेत ना रह जालें, ऊ लहरात सागर बन जालें। पीयराहट में कोई उदासी ना, ई उल्लास के रंग ह। हवा में बउर के हल्की-सी गंध घुल जाले। आम के मंजर अभी पूरा ना फूटल बा, बाकिर ओकर इंतजार ही मन के बेचैन बना देला। ई बेचैनी दुख के ना, ई त जीवन के जगावे वाली हलचल ह।
एह दिन से भाषा भी बदल जाले। बात-बतिया में मिठास आ जाले, गाली भी हँसी में बदल जाले। गीत अपने-आप होठ पर आ जाले। कहीं मां सरस्वती के बंदना होखेला, कहीं बिना नाम के सुर बहेला। किताब के पन्ना पलटते-पलटते आदमी खिड़की से बाहर ताके लागेला—जइसे असली पाठ ओहिजे लिखाइल होखे।
जइसे-जइसे दिन बढ़ेला, बसंत पंचमी फागुन में ढलत जाले। ठंड के आखिरी टुकड़ा भी अब बोझ ना लागे। दुपहरिया लंबी हो जाले, छाँह गाढ़ हो जाले। देह में सुस्ती आवेला, बाकिर ई सुस्ती आलस ना, ई ठहराव ह। एह ठहराव में भीतर के आवाज साफ सुनाई देले।
फागुन लगते ही रंग खुल जालें। अब पीयर में लाल, गुलाबी, हरियर : सब घुल जालें। पलाश के फूल जइसे धरती पर आग टपका देलें। ढोलक के थाप कहीं दूर से कान में पड़ जाले। फगुआ के बोल हवा में तैरत रहेलें। ई गीत सुनला से पहिले महसूस होखेला। देह आपन लय खोज लेले।
फागुन में आदमी थोड़ा और आदमी बन जाला। ऊ नियम भूल जाला, हिसाब छोड़ जाला। हँसी खुल के आवेला, आँख टिक के देख लेले। लाज ढीली पड़ जाले, मन हल्का हो जाले। औरतियन के चूड़ी जादा बोले लागे, मरदन के आवाज में नरमी आ जाले। ई महीना सबके देह से नकाब उतार लेला।
बसंत पंचमी से फागुन ले के ई यात्रा भीतर के यात्रा ह। ई बतावेला कि जीवन सिर्फ जिम्मेदारी के नाम ना, ई रस के भी नाम ह। जब माटी, हवा, रंग आ मन एक सुर में आ जालें, तब कविता अपने-आप गद्य बन जाले, आ गद्य काव्य। ई मौसम लिखे के ना, जीए के ह।
फागुन समय ना ह, फागुन एगो अनुभूति ह। ई अनुभूति जब देह से टकरावेले त भाषा अपने-आप लचक जाले। शब्द अब सूचना ना देला, ऊ स्पर्श बन जाला। अर्थ अब समझावे के चीज ना रहेला, ऊ महसूस होखे लागेला। फागुन में सौंदर्य सजावट ना ह, ई त भीतर से उपजल एक कंपन ह—जवन आँख से पहिले त्वचा पर असर करेला आ बुद्धि से पहिले स्मृति में हलचल मचावेला।
फागुन के सौंदर्य के पहिचान रंग से ना, गंध से होखेला। ई गंध कोई एक फूल के ना, ई मिश्रित ह—माटी, पत्ता, बउर, धुआँ, पसीना, हवा। ई सुगंध के कोई निश्चित आकार ना होखेला, ई हर देह में अलग ढंग से उतर जाले। एही से फागुन के अनुभव निजी ह, बाकिर अकेला ना। सब महसूस करेलें, बाकिर हर कउनो अपने ढंग से। सौंदर्य इहे ह—साझा अनुभव, निजी अर्थ। फागुन में दृश्य भी कहानी कहेला। पीयर-लाल रंग आँख पर हमला ना करेला, ऊ धीरे-धीरे पसर जाले। पलाश के फूल जइसे चुपचाप आग जरा देले। सरसों के खेत लहरावेले, बाकिर ऊ शोर ना करेला।
सौंदर्य इहाँ भव्यता में ना, संयम में बसल बा। अधिकता होते हुए भी ई महीना कभी बोझिल ना लागे। हर चीज अपनी सीमा में रह के भी पूरी लगेली। ई संतुलन, ई अनुपात—फागुन के ललित भाव के आधार ह।
फागुन में देह पाठ बन जाले। देह पर लिखल सब कुछ—लाज, संकोच, भय—धोया जाले। आदमी अपने देह के भाषा दोबारा सीखेला। चाल में एक नई लय आवेला, बोल में एक नया उतार-चढ़ाव। हँसी अब औपचारिक ना, ऊ फैल जाले। रोष भी अगर उठेला त ऊ जल्दी पिघल जाले।भावनात्मक अतिशयता यहाँ विद्रोह ना, ई सहज बहाव ह। सौंदर्य इहे बहाव में ह।
फागुन के काव्यात्मकता बनावटी ना ह। ई किसी अलंकार के सहारे खड़ा ना होखे। ई त जीवन के साधारण क्षण से उपजेला—पनिया भरत मउगी, धूप में सूखत धोती, खलिहान में बिखरल भूसा, पोखरा के किनारे बइठल चुप्पी। इहे साधारण दृश्य जब संवेदना से भर जाला त काव्य बन जाला। फागुन बतावेला कि काव्य असाधारण घटना में ना, साधारण जीवन के गहराई में बसल बा।
भोजपुरी भाषा फागुन में आपन चरम सौंदर्य पा लेले। ई भाषा खुदे देहधर्मी ह—इसमें कठोरता कम, गोलाई ज्यादा। “बउर”, “गाछी”, “चउरा”, “पगडंडी”, “गोइठा”—ई शब्द केवल अर्थ ना देलें, ई पूरा वातावरण रच देलें। ई शब्द सुनते ही आँख, नाक, त्वचा—सब सक्रिय हो जाले। भाषा यहाँ दृश्य पैदा करेले, गंध रचेले, स्पर्श जगावेले। ई बहु-संवेदी अनुभव ही ललितता के मूल ह।
फागुन में लोकगीत सौंदर्य के सबसे सघन रूप में सामने आवेला। ई गीत किसी मंच खातिर ना, ई जीवन के बीच से उठेला। ढोलक के थाप दिल के धड़कन से मेल खा जाले। तान में कहीं विरह बा, कहीं ठिठोली, कहीं दबी चाह। ई गीत नैतिक उपदेश ना देला, ई जीवन के स्वीकार ह। सौंदर्य यहाँ आदर्श में ना, यथार्थ के रस में ह।
फागुन के हास्य भी सौंदर्य के हिस्सा ह। ई हास्य व्यंग्यात्मक ना, ई जीवनदायी ह। हँसी यहाँ किसी के ऊपर ना, किसी के साथ होखेला। ठिठोली में भी अपनापन बसल बा। ई महीना बतावेला कि सौंदर्य गंभीरता से पैदा होखे जरूरी ना, हल्केपन में भी गहराई हो सकेला।
स्त्री-पुरुष के संबंध फागुन में कौनो सिद्धांत के अनुसार ना चलें। ऊ स्वतःस्फूर्त हो जालें। नजर टिकेले, नजर हट जाले, चुप्पी बोल जाले। सौंदर्य यहाँ संकेत में ह, घोषणा में ना। कहे बिना बहुत कुछ कह दिहल जाला। ई अनकहा ही ललितता के प्राण ह।
फागुन में समयो ढील पड़ जाला। घड़ी के काँटा चलेला, बाकिर मन ओकरा से बंधल ना रहे। दुपहरिया लंबी हो जाले, साँझ अचानक आ जाले। ई समयबोध के विघटन सौंदर्य पैदा करेला, काहें कि आदमी अब उपयोगिता से बाहर निकल के अनुभूति में प्रवेश करेला।
ई महीना बतावेला कि सौंदर्य कवनो स्थायी वस्तु ना, ई घटना ह। ऊ घटेला—आँख, देह, स्मृति के बीच। ऊ तब पैदा होखेला जब आदमी खुद को थोड़ी देर खातिर भूल जाला। फागुन आत्म-विस्मरण के सौंदर्य ह। अपने-आप में डूब के, अपने-आप से बाहर निकल आवे के सौंदर्य।
जब फागुन बीत जाला, त ऊ स्मृति में सुगंध बन के रहि जाला। हर अगिला बरिस ऊ सुगंध आदमी के भीतर कहीं से जाग जाले। ई स्मृति भी सौंदर्य ह—काहेंकि ई वर्तमान में अनुपस्थित होके भी अनुभव में उपस्थित रहेले।
फागुन इहे सिखावेला—कि जीवन के ललित क्षण योजना से ना, खुलेपन से आवेलें। जब देह, भाषा आ संवेदना एक लय में आ जालें, तब सौंदर्य अपने-आप प्रकट हो जाला : बिना घोषणा, बिना सोर। फागुन बस एतने करेला—ऊ जीवन के भीतर छुपल काव्य के मौसम दे देला।
परिचय दास
प्रोफेसर, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय , नालंदा





