हिन्दूलोग के महान पर्व छठ सुरु

अजय कु. चौरसिया
वीरगंज ०३ अगहन
आराध्यदेव सूर्य के उपासना करके मनावल जाएवाला छठ पर्व के मुख्य विधि आजु से शुरू भईल बा । मुख्य विधि अन्तर्गत पहिलका दिन (चतुर्थी) के विधि मे नहाय–खाय कईल गईल बा । दुसरका दिन खरना, तिसरका दिन डुब रहल आ चउथका दिन उग रहल सूर्य के अघ्र्य देहल जाला ।
सूर्य उपासना परम्परा के मोहक पद्धति मानल गईल संसार मे इहे एगो अईसन पर्व ह जउना मे डुब रहल आ उग रहल सूर्य के पूजा कईल जाला ।
मानव सभ्यता के विकास नदी किनार होत भईल, पञ्चतत्व मेसे सूर्य आ जल अपरिहार्य तत्व रहला से ई दु तत्व उपर श्रद्धाभाव व्यक्त तथा जीवन, जगत्, प्रकृति, वनस्पति, ग्रह, नक्षत्र, संवत्सर, समय, काल सभी के कारक रहल सूर्य के आराधना से आपसी, सद्भाव, एकता आ सहिष्णुता के सन्देश ई पर्व मे रहल बा ।
छठ के पहिलका दिन (चतुर्थी) व्रती भोजन मे मछरी मासु, लसुन, पियाज, कोदो, मसुर वस्तु परित्याग करके इहे दिन से ब्रत रहेलन । पर्व के दुसरका दिन (पञ्चमी) खरना कईल जाला ।
गाई के गोबर से लिपपोत करके अरबा चाउर के पिसान से बनावल झोल से भूमि सुशोभित करके व्रतालु ई दिन दिनभर निर्जला व्रत रहेलन आ रात के चन्द्रोदय के बाद चन्द्रमा के खीर अर्पण कईल जाला ।
तिसरका दिन (षष्ठी) गहुँ आ चाउर ओखरी, जाँता भा ढेंकी मे कुटानी–पिसनी करके ओकरा से अनेकन मिठा खाद्य सामान बनावल जाला ।
उहे दिन अन्नबाहेक फलफूल, ठेकुआ, भुसवा, खजुरी, पेरूकिया तथा मूला गाँजर, हरदी, ज्यामिरी, नरिवल, समतोला, केरा, सुपुली, कोनिया, सरबा, ढाकना, माटी के हात्ती दउरा, छईटी मे राख के सभी परिवार के सदस्य सहित भक्ति एवम् लोकगीत गावत जलाशय मे पुगेलन ।
परिकारसब जलाशय के किनार मे राखे से पहिले उ जगहा आ पूजा सामान के व्रती पाँच बेर साष्टाङ्ग दण्डवत करेलन । ओकरा बाद व्रती सन्ध्याकालीन अघ्र्य के खातिर पानी मे घुस के डुब रहल सूर्य के आराधना करेलन ।
पर्व के चउथका (अन्तिम) दिन पारणा कईल कईल जाला । ई दिन सबेरे उषाकाल मे व्रत करेवालालोग फेनु जलाशय मे पुग के प्रातःकालीन सूर्य के अघ्र्य देहल जाला ।
अघ्र्य पुरा भईला के बाद सूर्य पुराण सुनेके चलन बा । व्रती छठ व्रत के कथा सुने आ सुनावे के परम्परा रहल बा ।
सूर्य के आदिदेवता भी मानल जाला । मानव मात्र के अस्तित्व के बाद सर्वप्रथम अँजोर देवेके, देह मे गर्मी उत्पन्न करेके आ रोगव्याधी से जोगावे के सूर्य हि रहल मान्यता मिलेला ।
संस्कृतिविद् रामभरोस कापडी के मुताविक साम्बपुराण मे आपन बाबु श्रीकृष्ण तथा महर्षि दुर्वासा के श्राप से कुष्ठरोग से पीडित कृष्णपुत्र साम्ब सूर्य के आराधना से रोगमुक्त भईल चर्चा कईल जाला ।
कउनो भी पूजा, अनुष्ठान इत्यादि कईला पर आरम्भ मे शुद्धीकरण के बाद सर्वप्रथम पञ्चदेवता आ विष्णु के पूजा करेके प्रचलन बा । पञ्चदेवता मेसे सूर्य भी एक हउवन । सूर्य के एतवार के देवता के रूप मे भी चिन्हल जाला ।
छठ शब्द षष्ठी शब्द के तद्भव रूप ह । षष्ठी के दिन षष्ठी के देवी के पूजा भईला से ई पर्व के नाम षष्ठी, छठी आ छठ भईल बुझल जाला ।
ई पर्व मे डुब रहल आ उग रहल सूर्य के अभिनन्दन कईला के अर्थ जीवन मे सुख, दुःख, रोदन आ हाँसो के समानरूप मे आ जीवन के पाटो के रूप मे लेहल ह ।
छठपर्व विशुद्धरूप मे प्रकति आ पुरूष के पूजा ह । सन्तान प्राप्ति के खातिर दैवी कृपा के अपेक्षा ई व्रत से कईले बा ।
अईसे देखल गईला पर सूर्य के पूजा जईसन देखल गईला पर भी पुराण मुताविक ई मूल प्रकृति के छौ वाँ अंश से उत्पन्न भईल भगवती देवी के पूजा बा ।
देवी भागवत मे षष्ठी देवी पुत्रहीन के पुत्र प्रदान, पत्नीहीन के पत्नी प्रदान, धनहीन के धन आ कर्मवान के उत्तम फल प्रदान करेके उल्लेख कईल बा । इहे चलते ई पर्व साझा समानता के पर्व के रूप मे लोककरण भईल मिलेला ।






