डुब रहल सूर्य के अर्घ देके चईती छठ मनावल जा रहल
वीरगंज २४ चईत
वीरगंज लगायत पर्सा, बारा, रौतहट, जनकपुर लगायत देशभर डुब रहल सूर्य के अर्घ देके चईती छठ मनावल जा रहल बा ।
अनेकन पोखरा, नदी सरोवरसब मे श्रद्धालुलोग सँझिया डुब रहल सुर्य के अर्घ देहले बाडन । छठ पर्व बरीस मे दु बेर मनावे के परम्परा रहल बा । डुब रहल सूर्य के अर्घ देवे खातिर छठघाट पर श्रद्धालुलोग के बहुते भिड लागल बा ।
चार दिन तक मनावल जाएवाला ई पर्व के पहिलका दिन मंगर के दिने व्रतालुलोग ‘नहाए खाए’ अर्थात् नहाके शुद्ध होके खालन । एहितरे पर्व के दुसरका दिन बुध के दिने खरना रसियावरोटी खाके मनावल गईल रहे ।
खरना के दिन व्रतालुलोग दिनभर उपवास निराहार रहके रात मे छठ देवता के आगमन के नेवता देत कुल देवता के पूजा कईले रहलन आ रात मे अरवा अरबाइन (नुन ना डालल) खाएवाला खईले रहलन ।
एहितरे तिसरका दिन बियफे के सँझिया गहुँ आ चाउर के ओखल, जाँता भा ढिकी मे कुटल पिसल अन्न के पीसान से बनावल अनेकन खाद्य सामान ठकुवा, भुसवा, खजुरिया, पेरुकिया जईसन पकवान आ अनेकन फलफूल तथा मूरई, गाजर, हरिहर हरदी के झार, निमो, नरिवल, समतोला, केरा, डागरा, सुपली, छईटी, ढाकन, माटी के हाथी परिवार के सभी सदस्य अनेकन भक्ति एवम् लोकगीत गावत जलाशय लगे बनावल छठ घाट तक जालन ।
षष्ठी के दिन आजु व्रतालु सन्ध्याकालीन अर्घ के खातिर पानी मे घुस के सूर्य ना डुबे तक डुब रहल सूर्य के आराधना करत दुनु हाथ मे पिठार आ सिन्दूर लगाके अक्षत फूल राखके आउर अघ्र्य सामान पालहा करके डुब रहल सूर्य के अर्घ अर्पण कईल गईल बा ।
अन्तिम दिन बिहान अर्थात् शुक के सबेरे फेनु छठघाट मे पुग के जलाशय मे घुस के षष्ठी के दिन जईसन उग रहल सूर्य के अर्घ देहला के बाद छठ पर्व समापन होखेला । महाभारत के मुताविक द्रौपदीसहित पाण्डव अज्ञातवास मे रहला पर उ गुप्तवास सफल होखो कहके सूर्यदेव के आराधना कईले रहली । उहे लोक कथन बमोजिम उहे समय से छठ मनावेके परम्परा के सुरुवात भईल कहल जाला ।






