छठपर्व के दुसरका दिन रसियाव रोटी, छठघाटसब दुलहिन जईसन सजावल गईल

अजय चौरसिया/
वीरगंज ०२ अगहन,
तराई मधेस के जिल्ला मे भव्यतापूर्वक मनावल जाएवाला छठ पर्व के तईयारी अन्तिम चरण मे पुगल बा । छठ के खातिर वीरगंज के अनेकन पोखरी आ नदी छठघाट के स्थानीयवासी के सहजोग मे विशेष रूप मे सजावेके काम लगभग–लगभग पुरा भईल बा ।
कैयन पोखरी के घाटसब मे सरसफाइ कईल बा । तराई मे छठ के आपन अलगे महत्त्व रहल बा । मिथिलाञ्चल के पौराणिक महत्त्व राखल वीरगंज स्थित घडिअडर्वा, नगवा, छपकैया, श्रीपुर पोखरी तथा रानीघाट सहित के पोखरी आ नदी के स्थानीयवासी के सक्रियता मे सरसफाइ करके सजावेके काम अन्तिम चरण मे पुगल बा ।
हरेक बरीस छठ मनावेवाला के सङ्ख्या मे वृद्धि हो रहला से छठ के खातिर जरुरी परेवाला सामान के व्यवस्था करे खातिर किनमेल करेवाला के बजारसब मे बहुते भीड देखल गईल बा । बितल बरीस से ई बरीस छठ मे जरुरी परेवाला सामान के मूल्य वृद्धि भईल स्थानीयवासी बतवले बाडन । ई बरीस बिहान (एतवार के) षष्ठी के दिन विधिपूर्वक सँझिया के अघ्र्य देवेके परम्परा भईला पर भी एकर मुख्य विधि काल्हु से निष्ठापूर्वक सुरु भइल बा ।
छठ पर्व के पहिलका दिन काल्हु व्रतालुलोग नहायखाय करके पर्व के सुरुवात कईले बाडन । छठ के दुसरका दिन आजु खरना (रसियाव रोटी) विधि कईल जाला । खरना के पाप के क्षय होखेवाला दिन भी कहल जाला । खरना के दिन रात गाई के गोबर से लिपपोत करके आरवा चाउर के पिसान से तईयार कईल झोल से भूमि सुशोभित करके व्रतालुलोग दिनभरि उपवास रहेलन ।
“सँझिया चन्द्रमा दर्शन कईला के बाद माटी के नयाँ चुल्हा मे आ माटी के नयाँ बरतन मे सक्खर, दूध आ चाउर के खीर पकावल जाला”, वीरगंज–१६ के जितेन्द्र चौरसिया कहनी, “अईसन खीर केरा के पाता मे राखके छठीमाता के चढावल जाला आ चढईला के बाद व्रतालु प्रसाद के रूप मे ग्रहण करेलन ।” एकरा के परिवार के आउर सदस्य भी प्रसाद के रूप मे ग्रहण करेके चलन रहल चौरसिया बतवनी । उनका मुताविक दोसर दिन सँझिया डुब रहल सूर्य के अघ्र्य देवे खातिर व्रतालुलोग छठघाट मे पुगेलन आ बिहान भईला उग रहल सूर्य के फेनु अघ्र्य देहला के बाद व्रत समाप्त होखेला ।
पारिवारिक सुख, शान्ति, बेमारी से मुक्ति तथा अनेकन मनोकाङ्क्षा पूरा होखो कहके उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक मनावल जाएवाला छठ पर्व के अवसर मे बजार तथा पोखरी, घाटसब मे भीड लागेला । अभी गाँव–गाँव घरघर मे छठ पर्व के गीत गुञ्जे लागल बा । एकरा सँगे सूर्यषष्टी अर्थात् छठ पर्व प्रारम्भ भईल बा । सूर्य के आराधना से सुख, समृद्धि आ सन्तान प्राप्ति एवं चर्मरोग ठिक होखेके जनविश्वास रहल बा ।
ज्योतिष शास्त्र के आधार मे छठ पर्व के समय मे ब्रह्माण्ड मे सूर्य दक्षिणायन ओरी होखेवाला भईला से कन्या राशि समय परेके आ ई समय के सूर्य प्रकाश प्रखर तथा प्रभावकारी आ मानव के खातिर फलदायी भी मानल गईल पण्डित शास्त्रीलोग के कहनाम रहल बा । छठ पर्व के मुख्य प्रसाद के रूप मे रहल फलफूल, मिठाई, आदी, ऊँख, ठेकुवा लगायत बाँस से बनल आउर सामान किनल जाला ।
छठ पूजा के खातिर नगर क्षेत्र मे विशेष सुरक्षा व्यवस्था मिलावल गईल पर्सा के प्रहरी उपरीक्षक कोमल शाह बतवनी । छठ के खातिर तइयार कईल घाटसब मे सुरक्षा के खातिर आउर पुलीस परिचालन करेके उनकर कहनाम बा । चार दिन तक मनावल जाएवाला ई पर्व मे व्रतालुलोग भोजन मे मछरी, मासु, लसुन, प्याज, कोदो, मसुर आदि परित्याग करके व्रत रहेलन ।
महाभारत मुताविक द्रोपती सहित पाँच पाण्डव अज्ञात बास मे रहला पर उ गुप्तबास सफल होखो कहके सूर्य देवता के आराधना कईल उल्लेख कईल बा । उ समय मे पाण्डवलोग मिथिला के किरात राजा के राज्य मे रहल रहलन । लोकगाथा मुताविक गुप्तबास सफल भईला के बाद उ समय से छठ पर्व मनावेके परम्परा चलत आईल जनविश्वास रहल बा ।
दोसर ओरी सूर्य पुराण मुताविक सर्वप्रथम अत्रिमुनि के पत्नी अनसुइया छठ व्रत कईला के बाद अटलसौभाग्य आ इच्छा पूरा भईला के बाद उहे दिन से छठ पर्व के सुरुआत भईल बुढ पुरनीयालोग बतावेलन । छठ पर्व मनावे के पछाडि धार्मिक मान्यता, वैज्ञानिक, ज्योतिषसम्बन्धी तत्वसब भी ओतने महत्त्व राखेला । “जउना मुताविक सूर्य तत्त्व से आपन ज्ञान के अभिवृद्धि करके जनकल्याण के खातिर महत्त्वपूर्ण मानल जाला । कहल जाला कि भौतिक विकास सूर्य उपर हि आधारित भईला से गाछि, पौधा, वनस्पति, प्राणी, जीवजन्तु सभी के अस्तित्त्व सभी सूर्य उपर निर्भर रहेला ।”

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