तीन दशक पहिले के मधेश चिनावे खातिर ‘कल्चरल भिलेज’
तीन दशक पहिले के मधेश चिनावे खातिर ‘कल्चरल भिलेज’

ढल्केबर २ जेठ
वन, वातावरण आ वन्यजन्तु संरक्षण के अभियान मे सक्रिय देवनारायण मण्डल तीन दशक पहिले के मधेश बुझावे खातिर ‘कल्चर भिले’ सञ्चालन कईले बानी । धनुषा के मिथिला बिहारी नगरपालिका–२, पुरनदाहा मे ई भिलेज बा ।
जनकपुरधाम–धनुषाधाम मार्ग मे परेवाला ई कल्चर भिलेज मे आन्तरिक तथा बाह्य पर्यटक के लक्षित करके परम्परागत फुस के घर बनावल गईल बा । मिथिला के कला संस्कृति, वेशभूषा, रहनसहन अवलोकन करेके सुविधा बा । मिथिला के परम्परागत खानपान उपलब्ध बा ।
मण्डल तीन–चार दशक अगाडि मधेश के गाँवघर, रहनसहन, वेशभूषा, खानपान आ कलासंस्कृतिबारे चिनावे खातिर ई भिलेज सञ्चालन मे लियावल बतवनी । उ कहनी, “हमनी एकरा के खुला सङ्ग्रहालय के रूप मे खोलले बानी । उ समय जईसन गाँवघर रहे उहे शैली आ ओईसने सामान के प्रयोग करके घर बनावल गईल बा । उ समय के घरायसी सामान तथा कृषि कामकाज मे प्रयोग होखेवाला उपकरणसमेत सङ्कलन करके इहाँ राखल बा ।”
उनका मुताविक बाह्य पर्यटक तथा सहर मे उकुसमुकुस के जिन्दगी बिता रहल आदमी के खातिरपुनर्ताजगी प्राप्त कररेवाला ई बढिया जगह बा । बाहर के पर्यटक अईला पर ईहाँ के प्रकृति आ संस्कृति मे मनोरञ्जन करेके चाहेलन । पर्यटक से खोजल जईसन वातावरण देवे खातिर परम्परागत किसिम के व्यवस्था कईल बा ।
इहाँ पाहुना के मधेश के संस्कृति देखावे खातिर हरेक सँझिया झिझिया, झरिझरी, ढोलपिपिही, सामा चकेवा, जटजटिन लगायत लोकनृत्य आयोजना कईल जाला । झिझिया टिम मे ३० जने संलग्न बाडन । ढोलपिपही बजावेवाला पाँच जने बाडन आ झरीझरी खेलेवाला २० जने के समूह करके कला क्षेत्र मे ७८ जने आबद्ध बाडन । एहितरे, ई कल्चर भिलेज से स्थानीय ११६ घरपरिवार जुडल बाडन । खुद सहित स्थानीय के जीविकोपार्जन मे दिगोपना के खातिर सभी के जोडल मण्डल बतावेनी ।
भिलेज मे आवेवाला अतिथि के खातिर उहे परिसर भितर उत्पादन कईल जैविक खेती के तरकारी, दाल आ आउर परिकार खाए मिलेके सुविधा बा । शाकाहारी के खातिर दाल, भात, अचार, पापड, तिलौरी, तिसौरी, बिरिया के तरकारी, कुम्हरौरी के तरकारी, अदौरी के तरकारी, पुदिना के अचार, धनियाँ के चटनी सहित अतिथि के माग के आधार मे खाना तईयार कईल जाला । मांसाहारी अतिथि के खातिर अलगे व्यवस्था बा ।
इहाँ माटी के बरतन मे खाना पकावल जाला आ माटी के बरतन मे खाना देहल जाला । माटी के बरतन मे पानी, चाय, काढा देहल जाला । ईहाँ चाय–कफी ना बनेला । एकर बदले आपन खेत मे उब्जावल सोइजन (सैजुन) के काँढा तईयार कईल जाला । मकई के जुँगा, मेवा के पाता, अर्जुना के डाँठ आ तुलसी के काँढा भी बनेला । लेमन ग्रास के चाय मिलेला ।
कल्चरल भिलेज मे जैविक विधि से खेती हो रहल उनकर कहनाम बा । रासायनिक खाद आ कीटनाशक विषादी के प्रयोग ना होखेला । स्थानीय कुछ किसान के जैविक खेतीसम्बन्धी तालिम भी देहले बाडन । उ किसान से उत्पादन कईल अन्न, तरकारी आ फलफूल कल्चरल भिलेज किनेला । अभी दस जने किसान के जैविक उत्पादन खरिद कर रहल बा । उलोग के बिया आ जैविक खाद भी भिलेज हि देवेला ।
“एके बेर जैविक खेती ओरी ना जाके क्रमशः अगाडि बढे खातिर परामर्श देहल गईल बा । आरीपाछि के गाँव के पाँच सय किसान के जोडेके लक्ष्य बा । अभी ११६ परिवार के जोडल गईल बा,” देवनारायण कहनी । अभी किसानलोग के आलु, कोभी आ टामाटर खेती करेके कहल बा । किसान के अईसन सभी उत्पादन किनके पाउडर, चिप्स, सस बनाके बेंचेके योजना बा । इहाँ फलफूल आ सागपात भी उब्जनी होखेला कहके उ बतवनी ।
दुध, गोबर आ इन्धन के खातिर आठ गो गाई पोसल बा । खाना गोबर ग्यास से पकावल जाला । ग्यास मे प्रयोग भईल गोबर से झोल खाद बनावल जाला । अभी खेती हो रहल ९ बिगहा जमिन मे इहेँ के खाद आ जैविक कीटनाशक पर्याप्त रहल देवनारायण बतवनी । इहाँ चार गो पोखरी मे मछरी पोसल बा । पोखरा मे मुर्गा आ हाँस पोसेके आ बाख्रापालन के भी तईयारी बा । मण्डल ९ बिगहा जमिन भाँडा मे लेके कच्लर भिलेज खोलले बानी । भिलेज निर्माण मे अभी तक ६० लाख रोपेया खर्च भइल आ योजना मुताविक काम पुरा होखे खातिर अभी ४० लाख रोपेया खर्च होखेके उनकर कहनाम बा ।







