परिचय दास से साहित्यिक बातचीत

परिचय दास से साहित्यिक बातचीत

प्रश्न : परिचय दास जी, रउरा के विचार में साहित्य आ समाज के बीच कइसन संबंध बा ?

उत्तर : साहित्य समाज से अलग होके ना जी सके। साहित्य समाज के दर्पण जरूर ह, बाकिर खाली दर्पण ना ह। दर्पण चेहरा देखावेला, साहित्य चेहरा के भीतर के बेचैनी भी देखावेला।

समाज में जे घटित होला, साहित्य ओकरा के केवल दर्ज ना करेला, ओकर अर्थ भी खोजेला। एगो घटना के समाचार बतिया सकेला, बाकिर साहित्य ओह घटना के भीतर के मनुष्य के पीड़ा, भय, आशा आ संघर्ष के आवाज देला।

हमरा लागेला कि साहित्य समाज के बदल देवे के दावा ना करे, बाकिर समाज के अपना बारे में सोचल जरूर सिखावे। जब आदमी दूसर आदमी के जीवन के अपना जीवन के तरह महसूस करे लागेला, तब साहित्य अपना सबसे बड़ काम कर चुकल होला।

 

उत्तर : सामाजिक प्रतिबद्धता के मतलब ई ना ह कि हर रचना में नारा होखे। साहित्य के प्रतिबद्धता ओकर दृष्टि में होला।

रचनाकार समाज के दुख, अन्याय, असमानता आ संघर्ष के देखेला आ ओकरा से आँख ना चुरावेला। बाकिर साहित्य के काम भाषण देहल ना ह। साहित्य मनुष्य के अनुभव के जटिलता के समझेला।

कई बेर एगो छोट कहानी, एगो कविता भा एगो पात्र समाज के बारे में ओतना गहिर बात कह देला, जेतना लंबा भाषण ना कह सके।

साहित्य में प्रतिबद्धता तब सार्थक होला जब ऊ रचना के कलात्मकता के नष्ट ना करे। विचार आ सौंदर्य के बीच संतुलन साहित्य के शक्ति ह।

प्रश्न : रउरा के विचार में भोजपुरी साहित्य के सबसे उपेक्षित पक्ष का बा ?

उत्तर : हमरा लागेला कि भोजपुरी साहित्य के आलोचनात्मक अध्ययन सबसे अधिक उपेक्षित पक्ष में से एगो बा। रचना बहुत हो रहल बा, बाकिर ओकर व्यवस्थित मूल्यांकन कम हो रहल बा।

दूसर पक्ष बा भोजपुरी के ज्ञान-साहित्य। विज्ञान, समाजशास्त्र, इतिहास, दर्शन, अर्थशास्त्र आ समकालीन विचार के भोजपुरी में अधिकाधिक सामग्री होखे के चाहीं।

भाषा तब मजबूत होला जब ऊ केवल भावना व्यक्त करे के भाषा ना रहके ज्ञान के भाषा भी बने।

तीसर बात, भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्य के अन्य भाषाओं में अनुवाद होखे के चाहीं। जब तक भाषा अपना सीमाओं के पार संवाद ना करी, ओकर व्यापक प्रभाव सीमित रह जाई।

प्रश्न : भोजपुरी के अकादमिक प्रतिष्ठा के बारे में रउरा का सोचत बानी ?

उत्तर : भोजपुरी के अकादमिक प्रतिष्ठा बढ़ रहल बा, बाकिर अभी बहुत काम बाकी बा। विश्वविद्यालयन में भोजपुरी पर शोध होखे के चाहीं। शोध केवल डिग्री खातिर ना, भाषा के ज्ञान-संपदा बढ़ावे खातिर होखे के चाहीं।

भोजपुरी के लोकसाहित्य, व्याकरण, इतिहास, आधुनिक कविता, कथा-साहित्य, प्रवासी साहित्य, महिला लेखन आ बाल साहित्य पर गंभीर शोध के आवश्यकता बा।

हमरा लागेला कि भोजपुरी के पढ़ाई के केवल भाषा के अध्ययन तक सीमित ना रखल जाए। भोजपुरी समाज, संस्कृति, इतिहास आ प्रवास के भी अध्ययन होखे के चाहीं। भाषा के विश्वविद्यालय में जगह मिलेला त ओकरा के ज्ञान के विषय बनावे के पड़ी। भोजपुरी एह योग्य बा।

प्रश्न : रउरा साहित्य में स्मृति के का महत्त्व मानत बानी ?

उत्तर : स्मृति मनुष्य के भीतर के एगो अदृश्य घर ह। आदमी जहाँ भी चल जाव, स्मृति ओकरा साथ चलत रहेला।

गाँव से शहर गइल आदमी अपना गाँव के साथ लेके जाला। विदेश गइल आदमी अपना भाषा, गीत, गंध आ परिवार के स्मृति के साथ लेके जाला।

साहित्य स्मृति के केवल बचावेला ना, ओकर पुनर्व्याख्या भी करेला। हम अतीत के जइसन भइल रहे ओइसहीं याद ना करीं। वर्तमान के अनुभव अतीत के अर्थ बदल देला।

भोजपुरी साहित्य में स्मृति के बहुत महत्त्व बा। भोजपुरी के गीत आ कथा में पीढ़ियन के स्मृति सुरक्षित बा। ई स्मृति केवल अतीत ना ह, वर्तमान के पहचान के आधार भी ह।

प्रश्न : रउरा के विचार में भोजपुरी लोकगीत के सबसे बड़ शक्ति का बा?

उत्तर : भोजपुरी लोकगीत के सबसे बड़ शक्ति ओकर सामूहिकता ह। लोकगीत अकेले आदमी के रचना ना रहेला। ऊ पूरा समाज के अनुभव से बनत बा।

सोहर में जन्म के खुशी बा, कजरी में ऋतु के संगीत बा, बिरहा में वियोग बा, विवाह गीत में परिवार आ समाज के पूरा संसार बा।

भोजपुरी लोकगीत में स्त्री के आवाज बहुत महत्त्वपूर्ण बा। कई बेर ऊ अपना दुख, शिकायत, प्रेम आ विरोध के गीत के माध्यम से व्यक्त करेली।

लोकगीत के संगीत के भीतर समाज के इतिहास छिपल बा। हमरा लागेला कि लोकगीत के केवल मनोरंजन के रूप में ना, बल्कि समाज के जीवित दस्तावेज के रूप में भी पढ़े के चाहीं।

प्रश्न : भोजपुरी में हास्य आ व्यंग्य के परंपरा के रउरा कइसे देखत बानी ?

उत्तर : भोजपुरी समाज के हास्य-बोध बहुत मजबूत बा। कठिन परिस्थिति में भी हँसे के क्षमता मनुष्य के जीवटता के प्रमाण ह।

भोजपुरी के हास्य खाली मनोरंजन ना ह। ओकर भीतर सामाजिक आलोचना भी बा। आदमी जब व्यवस्था पर सीधा हमला ना कर सकेला, त व्यंग्य के माध्यम से ओकरा पर प्रश्न उठावेला।

हास्य मनुष्य के भीतर के तनाव कम करेला, आ व्यंग्य समाज के भीतर के विसंगति के उजागर करेला।भोजपुरी साहित्य के एह परंपरा के अउरी विकसित करे के चाहीं। स्वस्थ हास्य समाज के मानवीय बनावेला, आ सार्थक व्यंग्य समाज के आत्मनिरीक्षण करावेला।

प्रश्न : आज के समय में भोजपुरी साहित्य के सामने बाजार के का चुनौती बा ?

उत्तर : बाजार अवसर भी ह आ चुनौती भी। बाजार साहित्य के अधिक पाठक दे सकेला, बाकिर कई बेर साहित्य के लोकप्रियता के नाम पर ओकर स्तर कम करे के दबाव भी पैदा करेला।

भोजपुरी के सामने ई चुनौती विशेष रूप से बा कि भाषा के केवल मनोरंजन आ सनसनी तक सीमित ना कर दिहल जाए।

भोजपुरी समाज के जीवन बहुत व्यापक बा। ओकरा में प्रेम बा, श्रम बा, प्रवास बा, राजनीति बा, गरीबी बा, शिक्षा बा, स्त्री जीवन बा, तकनीक बा, बदलत परिवार बा। साहित्य के एह पूरा जीवन के अभिव्यक्त करे के पड़ी। लोकप्रियता जरूरी बा, बाकिर साहित्यिक गरिमा के कीमत पर ना।

प्रश्न : रउरा के नजर में एक अच्छा लेखक के सबसे जरूरी गुण का होखे के चाहीं ?

सबसे पहिले संवेदना। जे लेखक दूसर के दुख महसूस ना कर सके, ऊ मनुष्य के बारे में गहिर साहित्य ना लिख सके।

दूसर जरूरी चीज बा जिज्ञासा। लेखक के हर चीज के बारे में प्रश्न पूछे के चाहीं। जे आदमी दुनिया के देखके कह देला कि ‘हम सब समझ गइल बानी’, ओकर रचनात्मक यात्रा ओही जगह समाप्त हो जाला।

तीसर चीज बा अध्ययन। प्रतिभा जरूरी बा, बाकिर प्रतिभा के निरंतर अध्ययन से ही गहराई मिलेला।चउथी चीज बा ईमानदारी। लेखक के अपना अनुभव आ अपना भाषा के प्रति ईमानदार रहे के चाहीं।

साहित्य में सबसे खतरनाक चीज बनावटीपन ह। पाठक बहुत जल्दी बुझ जाला कि लेखक सच बोल रहल बा कि साहित्यिक अभिनय कर रहल बा।

प्रश्न : रउरा के विचार में साहित्यिक प्रसिद्धि आ साहित्यिक महत्त्व में का अंतर बा ?

उत्तर : प्रसिद्धि जल्दी मिल सकेला आ जल्दी समाप्त भी हो सकेला। साहित्यिक महत्त्व समय के परीक्षा से गुजर के बनत बा। आज जे बहुत प्रसिद्ध बा, जरूरी ना कि सौ साल बाद भी पढ़ल जाई। आ आज जे कम पढ़ल जा रहल बा, संभव बा कि भविष्य ओकरा के बहुत महत्त्वपूर्ण माने।प्रसिद्धि के संबंध दृश्यता से बा, साहित्यिक महत्त्व के संबंध स्थायित्व से।

लेखक के अपना समय के पाठक से संवाद जरूर करे के चाहीं, बाकिर ओकरा के भविष्य के पाठक के बारे में भी सोचल चाहीं। साहित्य के असली यात्रा प्रकाशन के बाद शुरू होला।

प्रश्न : रउरा अपना रचनात्मक यात्रा के सबसे बड़ी उपलब्धि का मानत बानी ?

उत्तर : हम अपना बारे में उपलब्धि के अंतिम निर्णय देवे में संकोच करब। रचनाकार अपना काम के बारे में बहुत अधिक दावा करे लागेला त रचना से दूरी पैदा हो जाला। बाकिर एतना कह सकतानी कि हमरा हमेशा कोशिश रहल बा कि साहित्य के जीवन से जोड़के देखीं। भाषा के केवल अभिव्यक्ति ना, बल्कि संस्कृति, स्मृति आ मनुष्य के अनुभव के रूप में समझीं।

भोजपुरी, हिन्दी आ भारतीय भाषाओं के बीच संवाद के आवश्यकता हमरा हमेशा महसूस भइल बा।

अगर हमरा लिखल, कहल भा कइल कवनो काम से भाषा के प्रति कवनो नवयुवक में आत्मविश्वास पैदा भइल होखे, कवनो पाठक के अपना लोक के प्रति सम्मान बढ़ल होखे, भा कवनो विद्यार्थी के साहित्य के ओर आकर्षण भइल होखे, त हम ओकरा के अपना रचनात्मक यात्रा के महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानब।

प्रश्न : साहित्य के बारे में रउरा एगो वाक्य में का कहब ?

उत्तर :साहित्य ऊ जगह ह जहाँ मनुष्य अपना से बाहर निकलके दूसर मनुष्य के भीतर प्रवेश करे ला।आ शायद एही कारण से साहित्य आजो जरूरी बा। दुनिया में आदमी बहुत बढ़ गइल बा, बाकिर मनुष्य के जरूरत अभी बाकी बा।

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