बहरूपिया

बहुरुपिया बन बैठल ई करोनवा
सबके जान के बन गईल दुशमनवा।
ई सभ सुन सुन के गारी फजीहत
करोनवा के आइल रोना।
अपना मन पर हाथ राख के
सांच-सांच कह दिही जमाना।
बहुत जरुरी हो गईल रहे
तू इंसान के रोकना।
आज के रोकल भले खराब रहे
बाकी ऐहू जिनकी के सबक रहे।
लड के संभर के ही जीते के बा
अइसन चुनौती स्वीकारे के बा।
भले घर में रहे पड़ल
बाकी जिंदगी त सभ के संवर गईल।
हवा, पानी,प्रकृति सब बांचल
फेर से सुंदर माहौल फनल।
इतिहास करोनवा के याद करी
सभ तरह के बात कही।
केहू सराही त केहू बेकार कही
धूल धुंआ सभ शोर थमल।
नदी, पहाड़ सब हंस पड़ल
जाया, जंतु सब चहके लागल।
आकाश में पंछी उडे लागल
केकर सुनी अब रोअल धोना।
बहरूपिया बन बैठल करोनवा
संजीवनी बाकी प्रकृति के मिलल।
आदमी डर डर के जियल
सुन के सब से फजीहत
करोनवा बा अब शरमाईल
आदमी तू हू आपन गलती के समझ।
फेर दूसरा के दोष तू दिह
अब काहे के रोना- धोना।
बंद करी सभी करोना के रोना।
पूनम आनंद(लेखिका)
पटना




