फगुनहट आ सिवरात

फगुनहट आ सिवरात

परिचय दास

प्रोफेसर, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा

फगुनहट के सांझ जइसे धीरे-धीरे देह में उतर जाला, ओइसहीं सिवरात के रतिया मन के भीतर उतरत जाले। ई रतिया सिरिफ जागरन नइखे, ई रतिया समय के धड़कन के सुने के रतिया ह। गाँव के कच्चा आँगन में धूनी सुलगत बा बेलपत्र के हरियर गंध हवे आ दूर कहीं मठिया से घण्टा के आवाज आवत बा—जइसे पृथ्वी आपन हृदय खोल के आकाश से बतियावत होखे।

ई पर्व एक गहिर प्रतीक-रचना ह। जइसे कार्ल जुंग मनुष्य के भीतर ‘आर्केटाइप’ के बात करेलें, ओइसहीं सिव के मूर्ति में आदिम पुरुष के छवि बसल बा। जटा में गंगाजल, माथ पर चन्द्रमा, गला में सर्प—ई सब प्रतीक मन के अँधियार में छुपल ऊर्जा के रूपक ह। सिवरात ओ ऊर्जा के स्वीकार के रतिया ह, जब मन आपन भीतरी अराजकता के सामने शांत होके खड़ा हो जाला।

पश्चिम में अँधियार के अक्सर नकारात्मक मानल गइल बाकिर आधुनिक चिन्तन में अँधियार आत्म-अवलोकन के जगह बन गइल। फ्रेडरिक नीत्शे लिखले रहलें~ “जेकरा भीतर अराजकता नइखे, ऊ तारा जनम नइखे दे सकत।” सिवरात ओ अराजकता के पूजेला। ई रतिया तप के रतिया ह, जब मन भीतर के विष पीके नीलकंठ बने के साधना करेला। उपवास के अर्थ सिरिफ भोजन से दूरी नइखे, ई इंद्रियन के शोर से दूरी ह—ताकि आत्मा के स्वर साफ सुनाई दे सके।

गाँव में मेहरारू गोर-गोर माटी से सिवलिंग गढ़ेली, त उ शिल्प सिरिफ सरधा नइखे, उ सृजन के सहज रचनात्मकता ह। सौंदर्यशास्त्र में ‘मिनिमलिज़्म’ के बात होखेला—कम साधन, अधिक अर्थ। सिवरात के पूजा ओही न्यूनतम में अधिकतम के दर्शन करावेला। एक लोटा जल, कुछ बेलपत्तर आ मौन—बस एतने में ब्रह्मांड समा जाला।

रात भर जगला के परंपरा भी रोचक ह। पश्चिम में ‘विजिल’ के धारणा बा—अँधियार में दीप जला के प्रतीक्षा। सिवरात के जागरन में उ प्रतीक्षा मिलेला—जइसे मन परम मौन के आवे के राह देखत होखे। ई रतिया समय के रेखीय गति के तोड़ देला। घड़ी के काँटा थम जाला, आ क्षण अनन्त में बदल जाला।

भोजपुरी लोक में सिव बहुत निकट के देवता हउवें। ऊ राजा हउवें, फकीरो। ऊ कैलास के शिखरो पर बइठेले आ खेत-खरिहान के मेड़ियो पर मिल जाले। नृविज्ञान कहेला कि देवता ओ समाज के सामूहिक आकांक्षा के रूप होखेलें। सिवरात में हमनी के समाज आपन पीड़ा, आपन हँसी, आपन अभाव—सब कुछ शिव के चरण में धर देला।

ई पर्व में देह आ आत्मा के द्वंद्व मिट जाला। नृत्यरत नटराज के छवि में ब्रह्मांड के गत्यात्मकता बसल बा। जइसे माइकल फूको सत्ता आ संरचना के भीतर छुपल ऊर्जा के खोजत रहलें, ओइसहीं शिवरात समाज के रूढ़ि के भीतर छुपल स्वतंत्रता के खोजेला। व्रत के अनुशासन में भी एक प्रकार के मुक्ति बा—काहें से कि अनुशासन भीतर के बिखराव के एक दिसा देला।

जब आधी रात बीत जाला, त मंदिर में शंख फूँकल जाला। ऊ ध्वनि जइसे अँधियार के गर्भ चीर के उजास के जन्म देत होखे। दर्शन में ‘कैथार्सिस’ के बात बा—भावनात्मक शुद्धि। शिवरात्रि ओही कैथार्सिस के लोक-रूप ह। रोअत-गावत, गावत-धुनात, मन आपन बोझ हल्का करेला।

भोजपुरी धरती पर ई पर्व सिरिफ धार्मिक अनुष्ठान नइखे; ई सांस्कृतिक उत्सव ह। जइसे खेत में हल चले के बाद धरती साँस लेवेला, ओइसहीं शिवरात के बाद मन हलुक हो जाला। बेलपत्र के हरियरपन, धतूरा के कड़वाहट, भांग के मस्तपन—ई सब जीवन के विविध रस के प्रतीक ह। अस्तित्ववाद कहेला कि जीवन के अर्थ मनुष्य खुद रचेला। सिवरात में मनुष्य आपन अर्थ खुद गढ़ेला—माटी के सिवलिंग में, मौन के साधना में, सामूहिक गीत में।

भोर होते-होते जब पूरब से उजाला फूटेला, त रतिया के तप पूर्ण हो जाला। ई उजाला सिरिफ सूरज के नइखे; ई भीतर के प्रकाश ह। शिवरात्रि हमनी के सिखावेला कि अँधियार दुश्मन नइखे, ऊ सहचर ह। ओकरे भीतर से उजास जन्म लेला। पश्चिमी चिन्तन आ भोजपुरी लोक-आस्था एही बिन्दु पर आके मिल जाले—जहाँ मनुष्य अपने भीतर के गहराई से साक्षात्कार करेला।

सिवरात के रतिया में आकाश नीला-करिया चादर ओढ़ लेला, त नीचे धरती दीप के कतार सजावेला। ई दृश्य जइसे ब्रह्मांड के संवाद ह—ऊपर अनन्त, नीचे सीमित; ऊपर मौन, नीचे गीत। आ एही संवाद में मनुष्य आपन छोट-छोट पीड़ा भुला के विराट से जुड़ जाला। सिवरात एही जुड़ाव के नाम ह—जहाँ लोक आ दार्शनिकता, पूर्व आ पश्चिम, अँधियारा आ उजाला—सब एक ही बिन्दु पर आके समा जाला।

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