तराई मधेस मे जीउतिया पर्व शुरु

अजय कु. चौरसिया
वीरगंज २४ भादो
सभी तराई मधेस क्षेत्र के पवित्र ‘जीउतिया पर्व’ पर्सा, बारा, रौतहट, सर्लाही, महोत्तरी, धनुषा लगायत के क्षेत्र मे नहा खा (नहाके खाएके) करत आजु से धार्मिक विधि मुताविक शुरु भईल बा ।
व्रत रहेसे पहिले आजु के दिन जनानी ब्रतालुलोग नदी, तलाव भा पोखरा मे नहाके उहे जगहा मे घिउरा, तरोई के पाता मे भगवान् जिमुतवाहन आ दिवङ्गत पितृ के चिउरा, दही, अमोट (आँम के रस से तइयार होखेवाला खाद्य पदार्थ) आ पिना प्रसाद के रूप मे चढा के खुद भी खाएके आ परिवार के सभी सदस्य के खियावल जाला ।
एहितरे बिहान (बियफे के दिने) सबेरे चार बजे से उपवास रहके निराहार एवं निर्जला व्रत रहके परसो (शुक के दिने) सबेरे व्रत के पारण होखी ।
सयो बर्तालु जिल्ला के अनेकन जदी तथा पवित्र पोखरासब लक्ष्मी सागर, वरुणसागर, भार्गवसागर लगायत के पवित्र सरोवर आ नदी मे स्नान करके जिमुतवाहन के कथा सुनेलन । अईसन कथा बुढ पुरनिया से कहेके आ नयाँ ब्रतालुलोग से सुनेके चलन बा ।
व्रत रहे से पहिलका दिन मे (आजु) बर्तालु अनेकन जलाशय मे स्नान करके तरोई के पात मे पिना, सक्खर आ तोरी के तेल सहित के पदार्थ चढावेलन । देवता के चढावल तेल मेसे आपन अपान बालबच्चा के भी लगावल जाला ।
आजु पूजा के बाद कोदो के रोटी, नुनीके साग आ मछरी खाएके चलन बा जउना के स्थानीय भाषा मे ‘माछ मरुवा’ कहल जाला । एहितरे विधि मुताविक बिहान सबेरे काग, कौवा बोलेसे पहिले व्रती जनानीलोग ओंगठन पुरा करेली अर्थात कुछ खाएवाला ओठ मे लगावेली माकिर ई बेर ओंगठन खाएके साइत नइखे ।
ई बेर आजु रात १० बजे से पहिले हि व्रतीलोग खाएवाला सभी खाना खाएके पडि आ बिहान सबेरे कुछो ना खईहें ।
बहुते जईसन जनानी ओंगठन मे दही च्युरा खाईल जाला । ओकरा बाद शुरु होखी कठिन उपवास के क्रम । आश्विन कृष्णपक्ष के अष्टमी के दिन मनावेवाला ई व्रत विशेष कठिन रहल पकहामैनपुर गाँवपालिका स्थित सुजित त्रिपाठी बतवनी ।
सन्तान के दीर्घ जीवन, पुत्र प्राप्ति तथा पारिवारिक सुख शान्ति के खातिर मनावेवाला जीउतिया पर्व के धार्मिक सांस्कृतिक तथा तान्त्रिक महत्व भी रहल बा । पितृ पक्ष मे मनावेवाला पर्व मे जनानी खुदे दिवङ्गत पितृ के पिण्ड चढावली ।
एक बेर असफल भईल व्रती आजीवन व्रत रहे ना मिलेला । राजा शालिवहान के राज्य मे एगो जनानी के सात बेटा के दैत्य उठाके लेगईला के बाद राजा सातु बेता के दैत्य से फिर्ता लिअइला के चलते जनानीलोग उ दिन से शालिवहान के ‘जिमतुवाहन’ नामकरण करके राजा के सम्झना मे उपवास रहे लागला से ई व्रत शुरु भईल पौराणिक कथन बा ।






