पान के पत्ता जइसन देह
पान के पत्ता जइसन देह

परिचय दास
(प्रोफेसर, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा)
साँच कहीं त
कभी हम
पान के पत्ता जइसन पातर रहनी।
ई कौनो रूपक ना रहे।
ई त एगो पूरा मौसम रहे
जब हमार देह
हरियर चमक से भरल रहे।
गाँव के लइकी
कुआँ के लगे
बार सुखावत
हमके देखत रहली
आ हँस पड़त रहली।
हवा
हमार दुपट्टा
उड़ा ले जात रहे।
ओ बखत हम ना जानत रहनी
कि मेहरारू के देह
एक दिन
इतिहास जइसन पढ़ल जाई।
समय
धीरे-धीरे
हमार काँधा पर
एक अनकहल बोझ रख दिहलस।
अब दरपन में
हम खाली आपन चेहरा ना देखsतानी
बलुक ऊ सभे घरन के परछाईं देखsतानी
जहाँ-जहाँ से गुजर के आइल बानी।
नइहर के अँगना
आजो हमरा भीतर
पीयर दुपहिया जइसन बसल बा।
ओहिजा
आम के पेड़ से गिरत धूप
हमार बार में उलझ जात रहे।
माई के हँसी
हल्दी आ चाउर के सुगंध जइसन रहे।
बाबूजी के आवाज
कबो-कबो
बादर जइसन भारी हो जात रहे
बाकिर ओकर भीतर
बरखा के भरोसा लुकाइल रहे।
ओही जगह
हम पहिला बेर जाननी
कि प्रेम
हर बेर कविता में ना बसल रहेला।
कबो-कबो
ऊ चूल्हा के आग में
चमकत रहेला।
फेर एगो दिन
हमार विदाई हो गइल।
विदाई
भारतीय समय के
सबसे पुरनकी कविता ह।
सदियन से
अनगिनत बिटिया
ओकर पंक्तियन
दोहरावत आइल बाड़ी।
हमहूँ आ गइनी
दूसर घर में।
ससुरार के देहरी पर
जब पहिला बेर पाँव धरनी
त लागल
जइसे रोशनी के रंग बदल गइल होखे।
एहिजा
भीत
हमके गौर से देखत रहली
जइसे हम कौनो नया शब्द होखी
जेकरा के ई घर के भाखा
अभी सिखत होखे।
कबो-कबो
रात में
हम बार खोल के बइठ जानी।
खिड़की से आवत हावा
हमके ढाढ़स देले
आ हमके याद आवेला
कि हम आजो
एक मेहरारू बानी
खाली एगो भूमिका ना।
सिंगार
बहुत गुप्त चीज होखेला।
ऊ दरपन में ना
मन के गहराई में चमकेला।
जब हम
हलुक-सा चूड़ी पहन ले तानी
भा बारे में
हल्की खुशबू लगा ले तानी
त लागेला
समय कुछ नरम हो गइल बा।
दिन
रसोई आ आँगन के बीच
धीरे-धीरे बहत रहेला।
रात
कबो-कबो
लमहर गलियारा बन जाला
जवना में
हम आपन पुरनका जिनगी के
आहट सुनsतानी।
कवनो किताब में
हम पढ़ले रहनी~
“मनुख हमेशा घर खोजत रहेला।”
ओ पंक्ति के लगे
हमके लागल
जइसे हमार कहानी
ओही में लिखल बा।
काहे कि सच त ई बा
कि हमार दू घर बा
फिरो
कबो-कबो
हम आपन के राह में पावsतानी।
बाकिर अब
ई बात से हम दुखी ना होखीं।
अब हम समझ गइल बानी
कि मेहरारू लोग
खाली घर ना बनावेली
ऊ समयो बनावेली।
उनकर चाल में
इतिहास के धड़कन होखेला
आ उनकर आँख में
भविष्य के हलुक उजाला।
आज
जब हम दरपन में देखsतानी
त ऊ लड़की याद आवेली
जे कबो
पान के पत्ता जइसन पातर रहे।
ऊ आजो कहीं बा
हमरा भीतर।
समय ओकरा के मिटवले ना
बस ओकरा के
थोड़ा अउरी गहिरा कर दिहलस।
आ धीरे-धीरे
हम समझे लगनी
कि शायद
कहीं के ना होखल
भी
एक किसिम के आजादी ह।
काहे कि तब
रउआ
पूरा धरती के हो सकेनी।






