प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा में पालि आ अउरी भाषा संकाय के संकायाध्यक्ष (डीन) नियुक्त
प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा में पालि आ अउरी भाषा संकाय के संकायाध्यक्ष (डीन) नियुक्त

भारतीय भाषा, साहित्य आ संस्कृति के प्रतिष्ठित संस्थान नव नालंदा महाविहार, नालंदा में वरिष्ठ साहित्यकार आ शिक्षाविद रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” के पालि आ अउरी भाषा संकाय के संकायाध्यक्ष (डीन) नियुक्त कइल गइल बा। ई नियुक्ति महाविहार के माननीय कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह द्वारा कइल गइल बा।
प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” नव नालंदा महाविहार के हिंदी विभाग में प्रोफेसर हउवें आ एहसे पहिले विभागाध्यक्ष के जिम्मेदारी भी निभा चुकल बाड़ें। एहसे अलावा ऊ एह संस्थान में प्रोवोस्ट ऑफ हॉस्टल्स, मीडिया प्रभारी आ जनसंपर्क प्रमुख जइसन कई गो महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्वन के सफलतापूर्वक निर्वहन कर चुकल बाड़ें। शिक्षा, संस्कृति आ साहित्य के क्षेत्र में उनकर सक्रिय उपस्थिति से ओह लोगन के राष्ट्रीय स्तर पर एगो खास पहचान मिलल बा। मनई लोग डिग्री खातिर जिनिगी भर लाइन में लागल रहेला, बाकिर कुछ लोग अइसन भी होला जे संस्था के पहचान बन जाला। दुनिया अभी पूरा उजड़ल नइखे।
ऊ हिंदी आ भोजपुरी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संस्कृतिविद, आलोचक आ संपादक के रूप में व्यापक रूप से जानल जालें। साहित्य, संस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा आ लोकचेतना पर उनकर काम खास तौर पर चर्चित रहल बा। उनकर लेखनी में भारतीय समाज, लोक-संस्कृति, आधुनिक संवेदना आ भाषाई बहुलता के गहिर समन्वय देखे के मिलेला। हिंदी, भोजपुरी, मैथिली आ भारतीय साहित्यिक परंपरा पर उनकर गंभीर अध्ययन ओह लोगन के समकालीन बौद्धिक जगत में एगो विशिष्ट स्थान दिलवले बा। भारत सरकार उनकर प्रतिनिधित्व खातिर विश्व हिंदी सम्मेलन में फिजी भेजले रहुवे।
प्रो. परिचय दास हिंदी अकादमी के सचिव आ मैथिली-भोजपुरी अकादमी के सचिव के रूप में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा चुकल बाड़ें। उनकर कार्यकाल में कई गो साहित्यिक, सांस्कृतिक आ अकादमिक गतिविधियन के नया ऊर्जा मिलल। भाषा आ साहित्य के प्रचार-प्रसार में उनकर प्रशासनिक दक्षता आ सांस्कृतिक दृष्टि के व्यापक सराहना भइल।
उनकर राष्ट्रीय छवि एगो अइसन साहित्यकार के रहल बा जे अकादमिक गंभीरता आ लोकसंवेदना दुनो के साथे लेके चलेलें। ऊ खाली विश्वविद्यालय के आचार्य ना, बलुक जन-संस्कृति आ भारतीय भाषन के सक्रिय हस्ताक्षर मानल जालें। देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयन, साहित्यिक संस्थानन आ सांस्कृतिक मंचन पर उनकर व्याख्यान खास रूप से चर्चित रहल बा। भारतीय साहित्य, आलोचना, लोक परंपरा, भक्ति आंदोलन, समकालीन कविता आ सांस्कृतिक विमर्श पर उनकर वैचारिक उपस्थिति लगातार दर्ज होत रहल बा।
प्रो. परिचय दास के कई गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा, जवना में कविता, आलोचना, ललित निबंध, सांस्कृतिक अध्ययन आ भारतीय साहित्य से जुड़ल ग्रंथ खास रूप से उल्लेखनीय बा। उनकर भाषा में वैचारिक गहराई के साथ-साथ रचनात्मक लालित्य भी देखे के मिलेला। ऊ ओह साहित्यकारन में गिनल जालें जे अकादमिक लेखन आ रचनात्मक साहित्य के बीच एगो जीवंत सेतु बनवले बाड़ें। साहित्य में ऊ “सुगद्य” नाम से एगो नई विधा के शुरुआत कइले बाड़ें। साहित्यिक दुनिया में नया विधा शुरू करे वाला लोग कम होला, बाकिर आलोचक लोग हर युग में मुफ्त में उपलब्ध रहेला। ई भी भारतीय परंपरा के एगो स्थायी सांस्कृतिक अवदान बा।
साहित्य आ संस्कृति के क्षेत्र में उनकर उल्लेखनीय योगदान खातिर ओह लोगन के कई गो राष्ट्रीय आ साहित्यिक सम्मान से सम्मानित कइल जा चुकल बा, जवना में श्याम नारायण पाण्डेय सम्मान, द्विभागीश अनुवाद सम्मान, भगीरथ सम्मान आ माटी के लाल सम्मान प्रमुख बा। हिंदी आ भारतीय भाषन के प्रति उनकर समर्पण के साहित्यिक जगत में विशेष आदर के साथ देखल जाला।
परिचय दास जी “परिछन” ( भोजपुरी~ मैथिली पत्रिका ) के संस्थापक संपादक, “इंद्रप्रस्थ भारती” हिन्दी पत्रिका के संपादक रहि चुकल बाड़न, “समाचार विंदु” भोजपुरी साप्ताहिक समाचार पत्र के प्रधान संपादक बाड़े आ “गौरवशाली भारत” मासिक हिंदी पत्रिका के प्रधान संपादक बाड़े।
परिचय दास के प्रमुख किताबन में अनुपस्थित दिनांक, कविता के मद्धिम आँच में, चारुता, आकांक्षा से अधिक सत्वर, धूसर कविता, संसद भवन की छत पर खड़ा होके आ एक नया विन्यास शामिल बा।





