नतीजा दहेज के

बहुते उछाह से बियाह कइली बेटा के ,
अवते पतोह मोह लिहलस छन में ।
अँखिया के आस नाश सरधा के भइल ,
मन के मुराद मोरा मरी गईले मन में ।।
चितबदला के जड़ी खर दिन के पियाई के ,
मति भरमईलस मोरा सरवन के ।
पनिया पढ़ोड़ के पतोहिया पिअलस ,
घुमवल हमरा बचवा के मन के ।।
बेटवा पतोह रहे दिने रानी घरवे में ,
एके दरे बईठे से धँसली ई धरती
दर्शन के तरसे ल सूरुज भगवान रोजे
चाँद छछनत बाटे रुपवा निहरती ।।
सोची सोची सास दिन रात दुबरात बाड़ी ,
कहियो पतोह भोरे अँगना बहरती ।
दिनभर के थाकल रतिया में सुते बेरी ,
मलिया मे तेल ले के पकरा पे धरती ।।
पढ़ल पतोह बिया दिआ अस जरतिया ,
घर में अँजोर नाही अगिये लगावेले ।
बिया अपने मन के बहुत बन ठन के ,
बइठल घर में से कहना अढ़ावेले ।।
बेड टी ले आव सासु भोजनों बनाव हाली ,
देरी कबो होखेला त अँखिये देखावेले ।
रोजे बने निक नोहर तबो कहे लेजा
होहर , हाथे थारी टारी मुँह बिजुकावेले ।।
पतोह के जवाब
तोहरे बेटा से कम पढ़ले न बानी हम ,
तबो लिहलु खर्चा तू जोड़ी के पढ़ाई के ।
रोपेया दहेज के तू रखलू सहेज के ,
परिछलू पतोह सासु बहूते धधाई के ।।
देले बानी दाम हम कबो ना करब काम ,
असुल करब सब तोहके खटाई के ।
जबले दहेज रही असहीं पतोह करी ,
साँच कहे अनगढ़ सभे समुझाई के ।।
अनगढ़ मुम्बई





