फगुआ : रंग, राग आ गाँव के साँस
फगुआ : रंग, राग आ गाँव के साँस

परिचय दास
फगुआ आवेला त लागेला जइसे धरती अपना पुरनका संदूकिया खोल के रंग के गंध हवा में उड़ा देले होखे। जाड़ा के सुस्त साँस अब पतली हो चुकल बा, धूप के देह नरम पड़ गइल बा आ खेत में गेहूँ के बालि हल्की हवा से बतियावत बाड़ी। आम के बउर में एगो मीठ सुगंध छिपल रहेला, जे चुपके से मन में घुस जाला। फगुआ के आवे के आवाज़ ढोल से पहिले हवा सुनावेला।
गाँव के गलियन में आज कुछ अलग चमक रहेला। पगडंडी पर चलत लोगन के चाल बदल जाला, जैसे पैर खुद-ब-खुद थिरक उठेला। कुआँ पर पानी भरत मेहरारू लोग गीत छेड़ देला। गीत में विरह के महीन लकीर बा बाकिर ओहमें हँसी के उजास जादे बा। फगुआ में दुखो रंगीन हो जाला। दुख के भी चेहरा पर गुलाल के परत चढ़ जाला आ ऊ कुछ देर खातिर चुपचाप मुस्की मार देला।
बचपन में जब पहिला बेर पिचकारी हाथ में आइल रहे, त लगल रहे जइसे दुनिया के राज मिल गइल होखे। ओह पतली धार में खाली पानी ना रहे, ओह में भरोसा रहे कि जीवन सिर्फ़ बोझ ना ह, खेल भी ह। दादी के अँचरा में बँधल अबीर के पोटली आजुओ आँख के कोना में चमक जाला। ऊ अबीर खाली रंग ना रहे, ऊ नेह रहे, अपनापन रहे। फगुआ सिखावेला कि मनुख के भीतर जवन कोमल कोना बा, ऊ अबहियो बचल बा।
ढोलक के थाप जब चौपाल पर गूँजेला, त बूढ़-बाबा के आँख में चमक उतर आवेला। आवाज़ में समय के खरखराहट रहेला, बाकिर सुर में अजीब मिठास घुल जाला। फगुआ के गीत में छेड़छाड़ बा, शरारत बा आ कहीं-कहीं करेजा के टीस भी बा। “होली खेले रघुवीरा” के गूँज होखे चाहे “फगुआ में धनी मोरा” के टेर, हर पंक्ति में जीवन के नमी समाइल रहेला। गीत जइसे कहेला—जीवन के रंग से डर मत, ओकरा में भीग जा।
फगुआ में जात-पात, ओह ऊँच-नीच के दीवार कुछ देर खातिर पतली पड़ जाली। लाल रंग के चुटकी जब मुँह पर चढ़ेला, त आदमी के पहचान धुँधला जाला। कवन जात, कवन पद—सब गुलाल के धुंध में घुल जाला। ई धुंध असल में उजाला ह। ई बतावेला कि हमनी के भीतर जे कठोर रेखा खिंचल बा, ऊ स्थायी ना ह। रंग के हल्की थपकी से ऊ नरम पड़ सकेला।
खेत के मेड़ पर खड़ा पलाश जब आग नियर दहकेला, त लागेला धरती खुद फगुआ खेलत होखे। हवा में अबीर के महीन परत तैरत रहेला। बच्चा लोग हँसी में भींग जाला, जवान मन आँख से आँख मिलाके कुछ अनकहल बात कह जाला। बूढ़ा लोग छड़ी टेकत-टेकत मुस्की मारे ला, जैसे ऊ जानत होखे कि जीवन के साँच रंग ईहे ह—क्षण भर के, बाकिर अमिट।
शहर में फगुआ के रंग कई बेर प्लास्टिक के थैली में बंद हो जाला। ऊँचा-ऊँचा मकान, बंद दरवाजा आ तेज़ बाजा के बीच रंग के असली सुगंध कहीं छिप जाला। बाकिर तबो, कवनो बालकनी से उछल के गिरल गुलाल जब हवा में फैल जाला, त पुरनका गाँव के स्मृति जाग उठेला।
फगुआ के असली घर मन में बसल बा। जहाँ स्मृति जिंदा बा, उहें फगुआ जिंदा बा। फगुआ में एगो अजब जोखिमो बा। रंग चेहरा ढाँप देला, पहचान ढीली पड़ जाली। शायद एही से कुछ लोग डेराला। बाकिर का पहचान एतना जरूरी बा? का हम कुछ घड़ी खातिर अपना बनावल खोल से बाहर ना निकल सकी? फगुआ धीरे से ई सवाल पूछेला। ऊ जोर जबरदस्ती ना करे, बस रंग के हल्की चुटकी उछाल देला। बाकी काम हवा कर देला।
साँझ होते-होते देह थक जाला, बाकिर मन में एगो चमक बचल रहेला। नहाए के बादो कान के पीछे, गर्दन के मोड़ में, नाखून के कोना में रंग के महीन रेखा बच जाला। ऊ रेखा जइसे कहेला—आज जीवन के साथ खेलाइल गइल। कुछ देर खातिर चिंता के दरवाजा बंद रहल आ मन खुल के साँस लिहलस।
फगुआ असल में स्मृति के पर्व ह। ऊ याद दिलावेला कि धरती पर दुख जितना गाढ़ होखे, रंग ओकरा से हल्का हो सकेला। ऊ कहेला कि मनुख के भीतर अबहियो करुणा के नमी बा। अगर हम ओकरा के सूख जाए देब, त दुनिया पत्थर हो जाई। बाकिर अगर रंग के चुटकी भर जगह दे देब, त कठोरता पिघल सकेला।
दूसरका दिन जब भोर के धूप आँगन में उतरेला आ जमीन पर सूखल गुलाल चमक जाला त लागेला दुनिया थोड़ा बदल गइल बा। शायद असल में दुनिया ना बदलल होखे बाकिर आँख बदल गइल होखे। फगुआ के असली कमाल ईहे बा—ऊ बाहर से कम, भीतर से जादे रंगेला। आ जवन भीतर रंगाइल, ऊ देर तलक फीका ना पड़ेला।
फगुआ हर बरिस आवेला बाकिर हर बरिस नया लगेला। जइसे जीवन के किताब में एगो रंगीन पन्ना फिर से खुल गइल होखे। ऊ पन्ना कहेला—कठोर मत बन, सूख मत जा, भीतर के बउर के बचा के रख। जब तक बउर में सुगंध बा, तब तक दुनिया में नेह के संभावना बा। फगुआ ओही संभावना के उजास ह, ओही उजास के भरोस ह।






