परिचय दास से साहित्यिक बातचीत
परिचय दास से साहित्यिक बातचीत

परिचय दास : भोजपुरी साहित्य के समकालीन स्वर, आलोचक आ सांस्कृतिक चिंतक।
परिचय दास भोजपुरी साहित्य के समकालीन दुनिया के एगो विशिष्ट आ बहुआयामी रचनाकार हईं। कविता, आलोचना, सुगद, संस्कृति-चिंतन आ लोकभाषा के साहित्यिक प्रतिष्ठा के क्षेत्र में उनकर योगदान उल्लेखनीय बा। भोजपुरी कविता के एगो नया मुहावरा दिहनी आ भोजपुरी साहित्य में एगो नई विधा “सुगद” के आरंभ कइनी। ऊ भोजपुरी के खाली बोलचाल के भाषा भा लोकजीवन के अभिव्यक्ति के माध्यम ना मानेलें बल्किन ओकरा के गंभीर साहित्य, विचार, आलोचना आ वैश्विक संवाद के सक्षम भाषा के रूप में देखेलें।
उनकर साहित्यिक दृष्टि के सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता ई बा कि ऊ लोक आ आधुनिकता, परंपरा आ समकालीनता, क्षेत्रीयता आ वैश्विकता के बीच कवनो कृत्रिम विरोध ना देखेलें। उनकर मान्यता बा कि लोकजीवन के भीतर मनुष्य के सार्वभौमिक अनुभव छिपल रहेला। एह से भोजपुरी के माटी से उठल कवनो आवाज दुनिया के कवनो कोना में रहत मनुष्य के भीतर तक पहुँच सकेला।
परिचय दास के रचनात्मक व्यक्तित्व के निर्माण में गाँव, लोकजीवन, भोजपुरी के जीवंत भाषिक संसार आ भारतीय साहित्य के गंभीर अध्ययन के महत्त्वपूर्ण भूमिका रहल बा। उनकर लेखन में भोजपुरी के सहजता, लोक-स्मृति, हास्य-बोध, करुणा, संघर्षशीलता आ मनुष्य के जीवन के असली ताप एक साथ उपस्थित बा।
ऊ भोजपुरी साहित्य के सामने मौजूद चुनौतियन के भी गंभीरता से देखेलें। उनकर विचार में भोजपुरी के विकास केवल बोलनिहार लोग के संख्या से ना होई, बल्कि गंभीर साहित्य, आलोचना, शोध, अनुवाद आ ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में ओकर विस्तार से होई। ऊ भोजपुरी के साहित्यिक परंपरा के व्यवस्थित अध्ययन, ओकर स्वतंत्र आलोचनात्मक दृष्टि के विकास आ विश्व के अन्य भाषाओं से ओकर संवाद के आवश्यक मानेलें।
परिचय दास के साहित्यिक चिंतन में भाषा के प्रश्न केवल भाषा के प्रश्न ना ह। भाषा उनकरा खातिर स्मृति, संस्कृति, पहचान आ मनुष्य के सामूहिक अनुभव के जीवित रूप ह। भोजपुरी उनकरा खातिर माटी के गंध, लोक के संगीत, पीढ़ियन के स्मृति आ मनुष्य के संघर्ष के आवाज ह।
एह बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व से भोजपुरी भाषा, साहित्य, लोक, आलोचना, वैश्विकता आ रचनात्मकता पर ई बातचीत प्रस्तुत बा।
प्रश्न : परिचय दास जी, रउरा के साहित्यिक यात्रा के शुरुआत कहाँ से भइल ?
उत्तर : हमार साहित्यिक यात्रा के शुरुआत कवनो एक दिन, एक घटना भा एक किताब से ना भइल। ई यात्रा धीरे-धीरे बनल। बचपन में गाँव के वातावरण, लोकजीवन, खेत-खरिहान, नदी, माटी, लोकगीत, कथा-कहानी आ लोगन के बोलचाल हमार भीतर बहुत गहिराई से बसत गइल। गाँव हमनी के खाली रहला के जगह ना होला, ऊ एगो जीवित पाठशाला होला। ओहिजा मनुष्य के जीवन के पहिला पाठ पढ़ल जाला।
बाद में जब हिन्दी आ भारतीय साहित्य के गंभीर अध्ययन कइल, त बुझाइल कि जे कुछ हम गाँव में देखले रहीं, सुनले रहीं आ महसूस कइले रहीं, ऊ सब साहित्य के बहुत बड़ सामग्री ह। साहित्य जीवन से बाहर से ना आवेला। जीवन के भीतर से, मनुष्य के अनुभव से, लोक के स्मृति से आ समय के संघर्ष से साहित्य के जन्म होला।
भोजपुरी हमरा खातिर खाली भाषा ना ह। ई हमार स्मृति ह, हमार संस्कार ह, हमार माटी ह। जब हम भोजपुरी में लिखतानी, त हमरा भीतर के बहुत पुरान आवाज जाग उठेला। ई आवाज में गाँव के गंध बा, लोक के संगीत बा, दुख-सुख के सहजता बा आ मनुष्य के जीवन के असली ताप बा।
प्रश्न : रउरा भोजपुरी के साहित्य में अपना स्थान के कइसे देखत बानी ?
उत्तर : साहित्य में अपना स्थान के बारे में खुद फैसला सुनावल ठीक ना होला। साहित्य के इतिहास लेखक खुद ना लिखेला, समय लिखेला आ पाठक लिखेला। बाकिर एतना जरूर कह सकतानी कि भोजपुरी साहित्य के प्रति हमार संबंध केवल लेखक के ना, एगो साधक के संबंध रहल बा।
हम भोजपुरी के केवल लोकभाषा के रूप में ना देखनी। भोजपुरी में लोक के विराट अनुभव बा। एह भाषा में जीवन के सहजता बा, हास्य बा, करुणा बा, संघर्ष बा, प्रेम बा, श्रम बा आ मनुष्य के जीवित आवाज बा। हमरा लागेला कि भोजपुरी के साहित्य के अपना भाषा-संसार के शक्ति के पहचानल जरूरी बा।
भोजपुरी के सबसे बड़ शक्ति ई बा कि ई जीवन के बनावटी ना बनावे। ई सीधे मनुष्य के जीवन से निकलत बा। भोजपुरिया समाज के भीतर जे जीवटता बा, जे हास्य-बोध बा, जे संघर्षशीलता बा, ऊ भोजपुरी के स्वभाव में मौजूद बा।
हमार प्रयास रहल बा कि भोजपुरी के साहित्य के खाली क्षेत्रीय सीमा में ना देखल जाय। भोजपुरी के लोकजीवन में जे अनुभव बा, ऊ सार्वभौमिक मानवीय अनुभव ह। गाँव के एगो दुख दुनिया के कवनो कोना में रहत मनुष्य के दुख हो सकेला। एगो माँ के पीड़ा, एगो मजदूर के थकान, एगो किसान के आशा, एगो स्त्री के संघर्ष, ई सब के भाषा भले अलग होखे, मनुष्य के अनुभव एक-दूसरा से जुड़ल रहेला।
प्रश्न : भोजपुरी में लिखे के प्रेरणा रउरा के कहाँ से मिलल ?
उत्तर : प्रेरणा हमरा के जीवन से मिलल। किताब से भी मिलल, बाकिर जीवन सबसे बड़ किताब ह। गाँव में रहत लोगन के देखल, उनकर बोलचाल सुनल, लोकगीत सुनल, पर्व-त्योहार देखल, गरीबी आ संघर्ष देखल, परिवार के भीतर के संबंध देखल, ई सब हमरा भीतर साहित्यिक संवेदना पैदा कइल।
भोजपुरी में लोग जब बोलत बा, त ऊ खाली सूचना ना देत बा। ऊ अपना पूरा इतिहास, संस्कृति आ अनुभव के साथ बोलत बा। एगो साधारण भोजपुरी वाक्य में भी कई पीढ़ियन के स्मृति छिपल हो सकेला।
हमरा लागेला कि भाषा के असली शक्ति ओकर व्याकरण में कम आ ओकर जीवन-संपर्क में अधिक होला। भोजपुरी के जीवन-संपर्क बहुत गहिर बा। ई भाषा खेत में बोलल जाले, घर में बोलल जाले, यात्रा में बोलल जाले, गीत में गावल जाले, दुख में रोवल जाले आ खुशी में हँसल जाले। एही से भोजपुरी के भीतर जीवन के पूरा संगीत मौजूद बा।
प्रश्न : रउरा के भोजपुरी के सबसे बड़ विशेषता का लागेला ?
उत्तर : भोजपुरी के सबसे बड़ विशेषता ओकर जीवंतता ह। ई भाषा जीवन से अलग होके ना रह सके। भोजपुरी में आदमी जब हँसेला त भाषा भी हँसेला, जब रोवेला त भाषा भी रोवेले, जब संघर्ष करेला त भाषा में भी संघर्ष के स्वर सुनाई देला।
भोजपुरी के एगो अद्भुत गुण ओकर आत्मीयता ह। ई भाषा दूरी कम कर देले। भोजपुरी में संबोधन के भीतर संबंध के पूरा संसार बसल बा। ‘तू’, ‘तुम’, ‘रउरा’ ई खाली सर्वनाम ना ह, ई सामाजिक आ भावनात्मक दूरी के संकेत भी ह।
भोजपुरी के दूसरा महत्त्वपूर्ण गुण ओकर हास्य-बोध ह। बहुत कठिन परिस्थिति में भी भोजपुरी समाज हँसे के रास्ता खोज लेला। ई हँसी पलायन ना ह, जीवन से लड़ाई के एगो तरीका ह।
भोजपुरी में करुणा भी बा, व्यंग्य भी बा, प्रेम भी बा, विद्रोह भी बा। एही कारण से हमरा लागेला कि भोजपुरी के साहित्यिक संभावना बहुत व्यापक बा।
प्रश्न : भोजपुरी साहित्य के सामने आज के सबसे बड़ चुनौती का बा ?
उत्तर : सबसे बड़ चुनौती बा कि भोजपुरी के अपना सामर्थ्य पर विश्वास करे के पड़ी। कवनो भाषा के विकास खाली एह से ना होला कि ओकरा बोलनिहार लोग बहुत बा। भाषा के विकास तब होला जब ओकरा में गंभीर साहित्य, आलोचना, शोध, अनुवाद आ ज्ञान-विज्ञान के काम बढ़ेला।
भोजपुरी के सामने एगो चुनौती ई भी बा कि हमनी के अपना साहित्यिक परंपरा के व्यवस्थित ढंग से देखीं। हमरा लगे भोजपुरी साहित्य के इतिहास, आलोचना, लोकसाहित्य, आधुनिक साहित्य आ समकालीन रचनाशीलता पर बहुत गंभीर काम के जरूरत बा।
दूसर चुनौती बा भाषा के बाजारू रूप से बचावल। भाषा के लोकप्रिय बनावल जरूरी बा, बाकिर लोकप्रियता के मतलब ई ना कि भाषा के केवल मनोरंजन के माध्यम बना दिहल जाए। भोजपुरी के भीतर गंभीर जीवन-अनुभव बा, ओकरा के साहित्य में सम्मान से जगह मिलल जरूरी बा।
भोजपुरी के भविष्य उज्ज्वल बा, बशर्ते हम ओकरा के केवल भावना से ना, ज्ञान, शोध आ रचनात्मकता से भी देखीं।
प्रश्न : रउरा के विचार में भोजपुरी के वैश्विक भाषा बनावे के राह का हो सकेला ?
उत्तर : भोजपुरी दुनिया के कई देश में बोलल जाले। प्रवासी समाज भोजपुरी के अपना स्मृति आ पहचान के साथ बचवले बा। बाकिर वैश्विक भाषा बने खातिर केवल बोलनिहार लोग के संख्या काफी ना होला। भाषा के वैश्विक प्रतिष्ठा ओकर साहित्य, ज्ञान, अनुवाद आ संस्थागत उपस्थिति से बनत बा।
भोजपुरी के भारत आ दुनिया के अन्य भाषा में अनुवाद होखे के चाहीं। भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्य अंग्रेजी, फ्रेंच, जापानी, रूसी आ अन्य भाषाओं में पहुँचे के चाहीं। ओही तरह दुनिया के श्रेष्ठ साहित्य भोजपुरी में आवे के चाहीं।
डिजिटल माध्यम भी बहुत महत्त्वपूर्ण बा। आज भाषा के भूगोल बदल गइल बा। एगो छोट गाँव के लेखक दुनिया के कवनो कोना में पढ़ल जा सकेला। ई अवसर भोजपुरी के सामने भी बा।
हमरा विश्वास बा कि भोजपुरी के भविष्य केवल भोजपुरी भाषी समाज के हाथ में ना, बल्कि ओकरा से जुड़ल पूरा विश्व के हाथ में बा। भाषा तब विश्वभाषा बनेले जब ऊ अपना लोक से जुड़ल रहके दुनिया से संवाद करेले।
प्रश्न : रउरा भोजपुरी साहित्य में आलोचना के का महत्त्व मानत बानी ?
उत्तर : साहित्य के विकास में आलोचना के भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण बा। आलोचना के काम केवल दोष गिनावल ना ह। आलोचना रचना के भीतर छिपल अर्थ, संवेदना, संरचना आ सौंदर्य के पहचान करेले।
भोजपुरी साहित्य में रचनाशीलता बहुत बा, बाकिर आलोचना के क्षेत्र में अभी बहुत काम होखे के बाकी बा। जब तक कवनो साहित्य के गंभीर आलोचना ना होई, तब तक ओकर साहित्यिक मूल्य के व्यापक स्तर पर स्थापित करे में कठिनाई होई।
हमरा विचार से आलोचना रचना के विरोधी ना, ओकर सहयात्री ह। रचनाकार अनुभव के रूप देला आ आलोचक ओकर अर्थ-संसार के समझे में सहायता करेला।
भोजपुरी साहित्य के आलोचना के अपना स्वतंत्र दृष्टि विकसित करे के पड़ी। हिन्दी साहित्य के आलोचनात्मक प्रतिमान के यांत्रिक ढंग से भोजपुरी पर लागू कइल हमेशा उचित ना होई। भोजपुरी के अपना लोक-संरचना, भाषा-संवेदना आ सांस्कृतिक अनुभव बा। ओकर आलोचना भी ओही जीवन-संदर्भ से विकसित होखे के चाहीं।
प्रश्न : रउरा खातिर साहित्य का ह ?
उत्तर : हमरा खातिर साहित्य मनुष्य के भीतर मनुष्य के बचवले रखे के सबसे सुंदर प्रयास ह।
साहित्य हमनी के बतावेला कि आदमी अकेला ना ह। ओकर दुख के कवनो दूसरा आदमी भी समझ सकेला। ओकर खुशी में कवनो अनजान पाठक भी सहभागी हो सकेला। साहित्य मनुष्य के भीतर संवेदना के जगह बनावेला।
हमरा लागेला कि साहित्य के सबसे बड़ काम ई बा कि ऊ हमनी के दूसर आदमी के जीवन में प्रवेश करे के क्षमता देला। जब हम कवनो पात्र के दुख पढ़के दुखी होखीं, कवनो कविता पढ़के भीतर से बदल जाईं, तब साहित्य अपना असली काम कर रहल होला।
साहित्य समाज के तुरंते ना बदल सकेला, बाकिर ऊ मनुष्य के भीतर बदलाव के बीज जरूर बो सकेला। आ कई बेर इतिहास में बड़ बदलाव ओही छोट बीज से शुरू भइल बा।






