धूसर आकाश में एक दीर्घ नक्षत्र

धूसर आकाश में एक दीर्घ नक्षत्र

परिचय दास

(प्रोफेसर, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय,नालंदा)

सर को अंतिम प्रणाम। उनके जैसा भला मानुष मिलना दुनिया में कठिन है! मनुष्यता उनसे सीख सकते हैं। उतने ही विनोदी व्यक्तित्व! रंग , रस और कटु तिक्त अनुभवों , बज्र कठिन जीवन जीकर कर यहां उच्च स्तर तक अपनी साधना से पहुंचने वाले शिक्षक~नायक !

उनके जैसे सहज~सरल व्यक्ति के जाने के बाद जो शून्य बचता है, वह केवल स्थान का खालीपन नहीं होता, वह समय की छाती पर पड़ी एक गहरी धँसी हुई आह होता है। प्रो. वैद्यनाथ लाभ का परलोक~गमन भी वैसा ही है। जैसे किसी शांत, संयत दीप ने बिना शोर किए अपनी लौ समेट ली हो और हम देर तक उस धुएँ की पतली रेखा को देखते रह गए हों, जिसमें स्मृतियाँ तैरती हैं।

मान्य प्रो. वैद्यनाथ लाभ केवल एक नाम नहीं थे, वे अपनी विनम्रता में छिपी हुई एक दीर्घ साधना थे। उनके शब्दों में किसी ऊँचे स्वर की आकांक्षा नहीं थी पर उनमें एक आंतरिक नाद था जो देर तक सुनाई देता था। वे बोलते कम थे पर जो कहते थे उसमें जीवन की तपिश और अनुभव की धूल साथ-साथ चलती थी। ऐसे लोग अपने पीछे काग़ज़ों से अधिक चरित्र छोड़ जाते हैं।

उनका जाना हमें अचानक अपनी ही नश्वरता का बोध करा देता है। जैसे कोई पुराना वृक्ष गिर जाए और तब समझ में आए कि उसकी छाया कितनी गहरी थी। वे जिस पीढ़ी से आए थे, वह पीढ़ी शब्द को साधना मानती थी, विचार को उत्तरदायित्व। उन्होंने अपने कर्म से यह विश्वास बनाए रखा कि साहित्य केवल प्रदर्शन नहीं, आत्मा का अनुशासन भी है।

शोक के इस क्षण में औपचारिक वाक्य बहुत छोटे पड़ जाते हैं। मृत्यु की अंतिम रेखा के सामने भाषा बार-बार असहाय हो जाती है। फिर भी स्मरण ही हमारा एकमात्र उपाय है। स्मरण में ही वह पुल है, जिससे होकर हम उनके पास लौट सकते हैं। उनकी हँसी, उनका संयम, उनका आत्मीय स्पर्श—सब कुछ जैसे भीतर कहीं सुरक्षित रखा हुआ है।

किसी शिक्षक का जाना विशेष रूप से दु:खद होता है क्योंकि शिक्षक केवल पाठ नहीं देते, वे दृष्टि देते हैं। वे सबके जीवन के शिक्षक थे ! श्रीमान वैद्यनाथ लाभ जी ने अपनी उपस्थिति से मेरे जैसे अनेक मनों में विचार की चिंगारी जलाई ।

वे अपने साथियों, मित्रों , विद्यार्थियों के भीतर अब भी जीवित रहेंगे, उनके उच्चारणों में, उनके लेखन में, उनके निर्णयों में। यही किसी गुरु , साधक की सच्ची अमरता है !!

इस समय शोक के साथ एक गहरा आभार भी मन में उठता है—कि हमें उनका सान्निध्य मिला, उनकी वाणी सुनी, उनके साथ समय बाँटा। मेरा तो जीवन बदला। जीवन की क्षणभंगुरता के बीच यही साझा क्षण सबसे स्थायी हो जाते हैं।

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे—यह कहना एक परंपरा है; पर उससे अधिक सच यह है कि वे अब हमारी स्मृतियों के आकाश में एक स्थिर तारा बन गए हैं। हम जब भी अपने भीतर की अंधेरी रात में रास्ता खोजेंगे, उनकी दी हुई रोशनी कहीं न कहीं झिलमिलाती मिलेगी। परिवार को सहन~शक्ति मिले, दिवंगत आत्मा को चिर विराम, मेरी प्रार्थना ।

श्रद्धांजलि शब्दों से नहीं, स्मरण की नमी से दे रहा हूं। आज वही नमी मेरी आँखों और हृदय में एक साथ उतर आई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: यो समाग्री सुरक्षित छ ।