परिचय दास से साहित्यिक बातचीत
परिचय दास से साहित्यिक बातचीत

खण्ड–२
प्रश्न : रउरा साहित्य में ‘लोक’ के का महत्त्व मानत बानी ?
उत्तर : हमरा खातिर लोक कवनो पिछड़ल, पुरान भा संग्रहालय में रखल चीज ना ह। लोक लगातार बदलत जीवन के नाम ह। लोक में मनुष्य के सामूहिक स्मृति रहेला। ओकर गीत, कथा, कहावत, रीति-रिवाज, भाषा आ जीवन-पद्धति में पीढ़ियन के अनुभव संचित रहेला।
हमरा लागेला कि साहित्य जब लोक से कट जाला, त ओकरा में जीवन के असली ताप कम हो जाला। लोक साहित्य के जड़ देला, बाकिर साहित्य के काम खाली जड़ में रह जाइल ना ह। ओकरा जड़ से रस लेके समय के नयका प्रश्नन से संवाद करे के चाहीं।
भोजपुरी के लोक में बहुत गहिर जीवन-दर्शन बा। एगो कहावत, एगो लोकगीत, एगो साधारण लोककथा में मनुष्य के जीवन के जटिल अनुभव छिपल हो सकेला। हमनी के काम बा कि ओह अनुभव के सम्मान से समझीं, ओकरा के केवल ‘लोक-सामग्री’ मानके इस्तेमाल ना करीं।
प्रश्न : भोजपुरी साहित्य में लोक आ आधुनिकता के संबंध के रउरा कइसे देखत बानी ?
उत्तर : लोक आ आधुनिकता एक-दूसरा के विरोधी ना ह। आधुनिकता के मतलब परंपरा के नकारल ना ह। आधुनिकता के असली अर्थ बा, समय के बदलत प्रश्नन के समझे के क्षमता।
लोक स्थिर ना होला। गाँव बदल रहल बा, परिवार बदल रहल बा, खेती बदल रहल बा, प्रवास बढ़ रहल बा, मोबाइल आ डिजिटल दुनिया गाँव के जीवन में प्रवेश कर चुकल बा। ई सब आधुनिकता के प्रक्रिया ह। बाकिर एह बदलाव के भीतर लोक के स्मृति अभी भी मौजूद बा।
हमरा लागेला कि भोजपुरी साहित्य के सामने सबसे रोचक संभावना ई बा कि ऊ लोक के स्मृति आ आधुनिक जीवन के तनाव के एक साथ अभिव्यक्त करे। एगो आदमी गाँव से शहर जाला, शहर से विदेश जाला, बाकिर ओकर भीतर गाँव कहीं ना कहीं जीवित रहेला। ई द्वंद्व भोजपुरी साहित्य के बहुत महत्त्वपूर्ण विषय हो सकेला।
प्रश्न : प्रवासी भोजपुरी समाज के रउरा साहित्यिक दृष्टि से कइसे देखत बानी ?
उत्तर : प्रवासी भोजपुरी समाज भोजपुरी के सबसे बड़ सांस्कृतिक शक्ति में से एगो ह। लोग जब अपना देश से दूर गइल, त भाषा ओकरा साथ गइल। भाषा ओकरा खातिर केवल बोलचाल के साधन ना रहल, बल्कि घर, गाँव, परिवार आ स्मृति के रूप में ओकरा साथ रहल।
प्रवासी समाज भोजपुरी के गीत, पर्व, कथा आ पारिवारिक संस्कार के माध्यम से भाषा के बचवले बा। ई बहुत महत्त्वपूर्ण काम ह।
बाकिर अब समय आ गइल बा कि भोजपुरी के प्रवासी अनुभव पर गंभीर साहित्यिक काम होखे। प्रवास खाली आर्थिक घटना ना ह। प्रवास के भीतर अकेलापन बा, पहचान के संकट बा, सांस्कृतिक स्मृति बा, नया समाज से संघर्ष बा आ नयका पहचान के निर्माण बा।
भोजपुरी साहित्य के प्रवासी अनुभव के अपना केंद्रीय विषय में शामिल करे के चाहीं। तब भोजपुरी साहित्य के संसार अउरी व्यापक होई।
प्रश्न : भोजपुरी साहित्य में स्त्री के उपस्थिति के रउरा कइसे देखत बानी ?
उत्तर : भोजपुरी समाज के सांस्कृतिक जीवन में स्त्री के भूमिका बहुत गहिर रहल बा। लोकगीत से लेके परिवार, खेती, प्रवास आ सामाजिक संस्कार तक स्त्री के योगदान के बिना भोजपुरी समाज के कल्पना ना कइल जा सके।
बाकिर साहित्य में स्त्री के केवल सहनशील, त्यागमयी भा दुख सहत पात्र बनाके प्रस्तुत कइल पर्याप्त ना ह। स्त्री के अपना इच्छा, बुद्धि, स्वप्न, संघर्ष आ निर्णय के साथ देखे के पड़ी।
भोजपुरी साहित्य में स्त्री के आवाज के अउरी मजबूत जगह मिले के चाहीं। भोजपुरी के लोकगीतन में स्त्री अपना दुख, प्रेम, विरोध आ आकांक्षा के बहुत निर्भीक ढंग से व्यक्त कइले बाड़ी। ई लोकपरंपरा हमरा खातिर बहुत महत्त्वपूर्ण ह।
आज के भोजपुरी लेखन के स्त्री के जीवन के भीतर से समझे के जरूरत बा। स्त्री पर लिखल आ स्त्री के अनुभव के भीतर से लिखल, ई दुनो में अंतर बा।
प्रश्न : रउरा के भोजपुरी कविता के भविष्य कइसन दिखाई देला ?
उत्तर : भोजपुरी कविता के भविष्य बहुत समृद्ध बा। कविता के असली आधार जीवन ह, आ भोजपुरी जीवन अनुभव से भरपूर भाषा ह।
भोजपुरी कविता में लोकगीत के संगीत बा, खेत-खरिहान के गंध बा, श्रम के लय बा, प्रवास के पीड़ा बा, प्रेम के सहजता बा आ सामाजिक संघर्ष के ताप बा।
अब भोजपुरी कविता के सामने चुनौती ई बा कि ऊ केवल भावुकता तक सीमित ना रहे। ओकरा में समकालीन जीवन के जटिल प्रश्न भी आवे के चाहीं। बेरोजगारी, प्रवास, तकनीक, पर्यावरण, स्त्री जीवन, जातीय-सामाजिक तनाव, बदलत गाँव, महानगरीय जीवन, ई सब आज के कविता के विषय हो सकेला।
भोजपुरी कविता के अपना लोक-संगीत के बचवले राखत आधुनिक संवेदना के अपनावे के पड़ी। परंपरा आ प्रयोग के बीच संवाद से कविता समृद्ध होई।
प्रश्न : रउरा भोजपुरी गद्य के बारे में का सोचत बानी ?
उत्तर : भोजपुरी गद्य के विकास के बहुत आवश्यकता बा। भोजपुरी में कथा, उपन्यास, निबंध, आलोचना, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत आ वैचारिक लेखन के बहुत संभावना बा।
भोजपुरी के बोलचाल में गद्य के स्वाभाविक शक्ति मौजूद बा। भाषा में कथा कहे के अद्भुत क्षमता बा। अब जरूरत बा कि भोजपुरी गद्य अपना विषय आ शिल्प के अउरी विस्तार दे।
हमरा लागेला कि भोजपुरी गद्य के केवल गाँव के जीवन तक सीमित ना रहना चाहीं। गाँव ओकर आधार जरूर हो सकेला, बाकिर भोजपुरी के संसार अब गाँव से बहुत आगे बढ़ चुकल बा। शहर, विदेश, प्रवास, तकनीक, शिक्षा, राजनीति, अर्थव्यवस्था, परिवार के बदलत रूप, ई सब भोजपुरी गद्य के विषय होखे के चाहीं।
भोजपुरी गद्य के सबसे बड़ शक्ति ओकर सहजता हो सकेला। बाकिर सहजता के अर्थ सरलता भर ना ह। सहज भाषा में भी गहिर विचार व्यक्त कइल जा सकेला।
प्रश्न : साहित्य में भाषा के शुद्धता आ सहजता के बीच रउरा कवन संबंध देखत बानी ?
उत्तर : भाषा के शुद्धता जरूरी बा, बाकिर शुद्धता के अर्थ भाषा के जीवन से काट दिहल ना ह। भाषा के असली शुद्धता ओकर स्वाभाविकता में बा।
भोजपुरी के अपना अनेक रूप बा। अलग-अलग क्षेत्र में उच्चारण, शब्द आ वाक्य-विन्यास में अंतर मिलेला। ई विविधता भाषा के कमजोरी ना, ओकर समृद्धि ह।
भाषा के मानकीकरण जरूरी हो सकेला, खासकर शिक्षा, प्रशासन आ अकादमिक काम खातिर। बाकिर साहित्य के भाषा पर अत्यधिक बंधन लगा दिहल ठीक ना ह। साहित्य भाषा के भीतर मौजूद अनेक स्वर के जगह देला।
हमरा लागेला कि भोजपुरी के साहित्यिक भाषा जीवन से जुड़ल, स्वाभाविक आ रचनात्मक होखे के चाहीं। भाषा के सबसे बड़ प्रमाण ओकर जीवन्त प्रयोग ह।
प्रश्न : आज के युवा भोजपुरी लेखकन से रउरा का अपेक्षा रखत बानी?
उत्तर : हम युवा लेखकन से सबसे पहिले पढ़े के अपेक्षा रखतानी। लेखक बने के पहिले पाठक बने के पड़ी। अपना भाषा के साहित्य पढ़ीं, अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य पढ़ीं, दुनिया के साहित्य पढ़ीं।
दूसर बात, जीवन के नजदीक जाईं। साहित्य केवल किताब से पैदा ना होला। समाज के देखीं, लोगन से मिलीं, अनुभव करीं, प्रश्न पूछीं।
तीसर बात, भोजपुरी के लेकर हीनभावना से मुक्त होखे के पड़ी। कवनो भाषा छोट ना होला। छोट-बड़ भाषा के धारणा अक्सर सत्ता आ बाजार बनावेला। भाषा के असली शक्ति ओकर रचनात्मकता में होला।
बाकिर आत्मविश्वास के साथ अध्ययन भी जरूरी बा। केवल भाषा के प्रेम काफी ना ह। साहित्य के इतिहास, शिल्प, आलोचना आ दुनिया के विचार से भी परिचित होखे के पड़ी।
प्रश्न : रउरा साहित्य में पुरस्कार आ सम्मान के का महत्त्व मानत बानी ?
पउत्तर : पुरस्कार लेखक के प्रोत्साहन देला, समाज के ध्यान ओकरा काम की ओर खींचेला आ कई बेर उपेक्षित साहित्यिक योगदान के पहचान दिलावेला। एह अर्थ में पुरस्कार के महत्त्व बा।
बाकिर पुरस्कार साहित्य के अंतिम प्रमाण ना ह। साहित्य के असली परीक्षा समय करेला। कुछ रचनाएँ पुरस्कार पावेली आ समय के साथ भुला दिहल जालीं। कुछ रचनाएँ बिना पुरस्कार के भी पीढ़ियन तक जीवित रहेली।
लेखक के पुरस्कार खातिर ना, अपना रचनात्मक सत्य खातिर लिखे के चाहीं। सम्मान मिल जाव त खुशी के बात बा, ना मिले त साहित्यिक यात्रा समाप्त ना हो जाला।
साहित्य में सबसे बड़ पुरस्कार ई बा कि कवनो पाठक कहे कि रउरा रचना ओकर जीवन के कुछ समझे में मदद कइलस। ई अनुभव बहुत गहिर होला।
प्रश्न : अंत में, रउरा भोजपुरी के भविष्य के बारे में का कहे चाहब ?
उत्तर :हम भोजपुरी के भविष्य के लेकर आशावादी बानी। भोजपुरी के पास विशाल जनसमुदाय बा, समृद्ध लोक-संस्कृति बा, जीवंत भाषा बा आ रचनात्मक प्रतिभा बा।
अब जरूरत बा कि भोजपुरी के अपना शक्ति के संगठित ढंग से पहिचानल जाए। शिक्षा में भोजपुरी के स्थान मजबूत होखे, उच्च शिक्षा में भोजपुरी पर शोध बढ़े, श्रेष्ठ साहित्य के अनुवाद होखे, डिजिटल माध्यम में गुणवत्तापूर्ण सामग्री बने आ भोजपुरी के साहित्यिक इतिहास के गंभीरता से लिखा जाए।
भोजपुरी के भविष्य केवल भोजपुरी बोलनिहार लोग के संख्या से तय ना होई। ओकर भविष्य एह बात से तय होई कि हम भोजपुरी में का लिखतानी, का सोचतानी आ दुनिया से कइसन संवाद करतानी।
हमरा विश्वास बा कि भोजपुरी अपना लोक से जुड़ल रहके दुनिया से संवाद करे के भाषा बन सकेले। भाषा के जड़ माटी में होखे, बाकिर ओकर शाखा आकाश तक जाए, एही में ओकर असली विस्तार बा।






