जन्माष्टमी : भक्ति, प्रेम आ धर्म के पावन पर्व
जन्माष्टमी : भक्ति, प्रेम आ धर्म के पावन पर्व

प्रिया मिश्र “मन्नु”……✍️
हमनी के संस्कृति में पर्व-त्योहार के विशेष महत्व बा। ई पर्व खाली धार्मिक आस्था के प्रतीक ना होलें, बल्कि समाज में प्रेम, सद्भाव, भाईचारा आ नैतिकता के भावना के मजबूत करे के काम भी करेलें। अइसने पावन पर्व में से एगो हऽ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में मनावल जाए वाला ई पर्व भारत के साथे-साथ नेपाल आ दुनिया के कई देश में श्रद्धा आ उल्लास के साथ मनावल जाला। जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जीवन, उनका विचार, कर्म आ मानवता के प्रति उनका संदेश के याद करे के एगो पावन अवसर हऽ।
हिन्दू धर्मग्रन्थ के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के जन्म भादो महीना के कृष्ण पक्ष के अष्टमी तिथि के मध्यरात्रि में मथुरा के कारागार में भइल रहे। उनका माता-पिता देवकी आ वसुदेव रहले। देवकी के भाई कंस एगो अत्याचारी राजा रहल। आकाशवाणी भइल रहे कि देवकी के आठवाँ संतान कंस के वध करी। एह भविष्यवाणी से डर के कंस देवकी आ वसुदेव के कारागार में कैद कर दिहलस आ उनका संतानन के एक-एक करके मारत गइल। आखिरकार अष्टमी के रात भगवान श्रीकृष्ण के जन्म भइल।
कृष्ण के जन्म के समय पूरा वातावरण अद्भुत हो गइल। कारागार के पहरेदार गहरी नींद में चल गइलें, बंद दरवाजा अपने-आप खुल गइल आ वसुदेव भगवान कृष्ण के गोकुल ले जाए खातिर निकल पड़लें। यमुना नदी पार करके ऊ नन्हकन कृष्ण के नन्द बाबा आ माता यशोदा के घर पहुँचा दिहलें। बाद में कृष्ण के पालन-पोषण गोकुल में भइल आ उहाँ ऊ अपना बाल लीला से सभके मन मोह लिहलें।
श्रीकृष्ण के बाल्यकाल के कथा हमनी के लोकजीवन में आजो बहुत लोकप्रिय बा। उनका माखन चोरी, गोपियन के साथे खेल, ग्वाल-बालन के साथे गाय चरावल आ राधा के साथे प्रेम के कथा लोग श्रद्धा से सुनावेला। कृष्ण के जीवन में बालपन के चंचलता के साथे-साथ गहिरा जीवन-दर्शन भी दिखाई देला। ऊ बतावेलन कि जीवन में प्रेम जरूरी बा, बाकिर प्रेम के साथे कर्तव्य, सत्य आ धर्म के पालन भी उतने ही जरूरी बा।
जन्माष्टमी के दिन भक्त लोग उपवास रखेला। बहुत लोग दिनभर फलाहार करके रात में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय तक पूजा-पाठ करेला। मंदिरन में विशेष सजावट कइल जाला। भगवान कृष्ण के बाल रूप के झूला में सजावल जाला। आधी रात के समय शंख, घंटा आ घड़ियाल के आवाज के बीच कृष्ण जन्म के उत्सव मनावल जाला। भक्त लोग ‘नन्द के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ जइसन भजन गावत आ भगवान के जयकारा लगावत खुशी मनावेला।
जन्माष्टमी के एगो खास आकर्षण दही-हांडी भी हऽ। श्रीकृष्ण के माखन बहुत प्रिय रहे, एह कारण उनका बाल लीला के याद में दही आ माखन से भरल मटकी ऊँचाई पर टांगल जाला। युवक लोग टोली बनाके मानव पिरामिड बनावेला आ मटकी फोड़ेला। ई परम्परा मनोरंजन के साथे सहयोग, एकता आ सामूहिक प्रयास के संदेश भी देला। अकेले आदमी के ताकत सीमित हो सकेला, बाकिर जब सभे मिलके काम करे ला त कठिन से कठिन काम भी आसान हो जाला।
भगवान श्रीकृष्ण के जीवन खाली बाल लीला तक सीमित ना रहल। महाभारत के समय ऊ अर्जुन के भगवद्गीता के उपदेश दिहलें। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन मोह आ दुविधा में पड़ गइल रहलें। तब श्रीकृष्ण उनका कर्म, धर्म आ जीवन के वास्तविक उद्देश्य के बारे में समझवलें। उनका सबसे प्रसिद्ध संदेश बा कि मनुष्य के अपना कर्म पर अधिकार बा, फल के चिंता में अपना कर्तव्य से पीछे ना हटे के चाहीं।
आज के समय में श्रीकृष्ण के ई संदेश अउरी महत्वपूर्ण हो गइल बा। आधुनिक जीवन में आदमी तनाव, प्रतिस्पर्धा, स्वार्थ आ चिंता से घिरल बा। हर कोई परिणाम के पीछे भाग रहल बा। अइसन समय में कृष्ण के कर्मयोग के संदेश हमनी के सिखावेला कि ईमानदारी से अपना जिम्मेदारी निभावल जरूरी बा। सफलता आ असफलता जीवन के हिस्सा ह, बाकिर सही रास्ता छोड़ल समाधान ना ह।
श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उनका धर्म आ न्याय के प्रति प्रतिबद्धता हऽ। कृष्ण अन्याय के सामने चुप रहला के समर्थन ना कइलें। कंस जइसन अत्याचारी के अंत कइलें आ महाभारत में अधर्म के विरुद्ध धर्म के पक्ष में खड़ा रहलें। उनका जीवन हमनी के ई सिखावेला कि अन्याय के सहन कइल भी कहीं न कहीं अन्याय के बढ़ावा देला। समाज में जब गलत के विरोध करे वाला लोग खड़ा होला, तबे न्याय के स्थापना संभव हो पावेला।
जन्माष्टमी के सामाजिक महत्व भी बहुत गहिरा बा। ई पर्व जात-पात, ऊँच-नीच आ भेदभाव से ऊपर उठके प्रेम आ मानवता के संदेश देला। भगवान कृष्ण के जीवन में गरीब, सामान्य आ अलग-अलग समुदाय के लोग से उनका आत्मीय संबंध देखे के मिलेला। सुदामा के साथे उनका मित्रता आजो सच्चा दोस्ती के सबसे सुंदर उदाहरण मानल जाला। कृष्ण आ सुदामा के कथा हमनी के बतावेला कि सच्चा मित्रता धन-दौलत ना, बल्कि प्रेम, विश्वास आ अपनापन पर आधारित होला।
आज जरूरत बा कि हमनी जन्माष्टमी के खाली पूजा आ उत्सव तक सीमित ना रखीं। भगवान कृष्ण के जीवन से प्रेरणा लेके अपना व्यवहार में सत्य, प्रेम, करुणा, साहस आ कर्तव्यनिष्ठा के अपनाईं। अगर हम मंदिर में कृष्ण के पूजा करीं, बाकिर घर से निकलते ही दूसर आदमी के अपमान करीं, गरीब के शोषण करीं, झूठ बोलीं आ अन्याय के समर्थन करीं, त हमरा पूजा के वास्तविक उद्देश्य पूरा ना होई।
जन्माष्टमी हमनी के भीतर के अंधकार के समाप्त करके ज्ञान आ सत्य के प्रकाश अपनावे के संदेश देला। कृष्ण के जन्म अंधकारमय कारागार में भइल रहे, बाकिर उनका आगमन से धर्म के प्रकाश फैलल। एहसे जन्माष्टमी के एगो आध्यात्मिक अर्थ ई भी बा कि मनुष्य अपना भीतर के डर, अहंकार, लोभ, क्रोध आ नकारात्मकता के समाप्त करके प्रेम, विवेक आ मानवता के जन्म दे।
आज जब समाज में आपसी दूरी बढ़त जा रहल बा, तब श्रीकृष्ण के प्रेम आ मित्रता के संदेश के अउरी जरूरत बा। जब अन्याय बढ़ेला, तब उनका धर्म आ साहस के जरूरत बा। जब मनुष्य निराश होला, तब गीता के कर्मयोग के संदेश ओकरा में नया विश्वास पैदा कर सकेला।
अंत में कहल जा सकेला कि जन्माष्टमी खाली भगवान कृष्ण के जन्म के उत्सव ना हऽ, बल्कि ई धर्म, कर्म, प्रेम, मित्रता, न्याय आ मानवता के उत्सव हऽ। कृष्ण के जीवन हमनी के सिखावेला कि परिस्थिति चाहे जइसन होखे, मनुष्य के सत्य आ धर्म के रास्ता ना छोड़ल चाहीं। प्रेम से समाज जुड़ेला, कर्म से जीवन सफल होला आ धर्म से मानवता के रक्षा होला।
आइं, एह जन्माष्टमी पर हमनी खाली कृष्ण के झूला ना झुलाईं, बल्कि अपना मन में भी प्रेम आ मानवता के झूला सजाईं। अपना भीतर के नफरत के समाप्त करीं, दूसर के दुख में साथ दीं आ अपना कर्तव्य के ईमानदारी से निभाईं। तबे जन्माष्टमी के असली संदेश हमरा जीवन में उतर पाई आ भगवान श्रीकृष्ण के प्रति हमार श्रद्धा सच्चा रूप ले पाई।
जय श्रीकृष्ण!






