माई हो

तू कहाँ चल ग्इलू?

जीते जिदगीं तू छछनवलू।

जब भी हफदरा में पड़नी
माई, तहरे के ढूढनी
सुख दुःख के सब राह में
तहरे साथे साथे सब सीखनी।

जीवन हरदम एगो संघर्ष ह
कबो फूल त कबो कांट ह।
बुद्धि के नीमन से राखे त
डेग डेग पर ही आनंद ह।

माई! तहर निस्वार्थ सेवा
याद हमेशा पडे़ला
एक एक बतिया के जरूरत
आजुओ सभका पड़ेला।

कुम्हार के माटी निईन माई
ल्ईकन के तू गढेलू
ठीक बजा के आंव पर चढ़ा के
जिंदगी के तू चमकावेलू।

ल्ईकन के पैसे में माई तू
करम कुकर्म से सहेलू
बाकी बिना कुछो सोचले तू
भूखे प्यासे वरत त्योहार करेलू।

पेट भर भोजननो प आफत
तबहूं दूध आपने पिअवलू
माई हो रात-दिन जाग जाग के
ल्ईकन के तू सुतवलू।

माई! हो!
तहर गुनवा, दिहलो न जाए
बाते बात पर रोवलो न जाऐ
माई हो! तसर गुण दिहलो न जाऐ।

आत्मा हमार, मर ग्ईल बा
तहरा ख़ातिर, समय भी ना मिलेला।
कतनो चिचिईअईबू त
सुनाईयो न पडे़ला।

हमरा के तू सब कुछ कर दिहलू
तनिको ना हिचकिचवलू
बाकी, तहरा बेरी, तू तकलू
सब ल्ईकन के पारा पारी।

ई त मनवा प बोझ बा
माई! हो!
सांच पूछ त,
जांगर चले, तबही ले खोज बा।

बाकी का कहल जाव
घरे-घरे अब ई दोष बा
माई! बाकी एगो तू ना बदललू
कतनो दुत्करला पर
तू चुमते चाटते पुचकरलू।

माई! हो!
तू कबो न बदललू।
तू याद त डेग डेग पडलू।

पूनम आनंद लेखिका पटना से भोजपुरी और हिंदी

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