राम नवमी राम: एक अनुभव, एक मौन आलोक

राम नवमी राम: एक अनुभव, एक मौन आलोक

परिचय दास

प्रोफेसर , नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय( संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ), नालंदा

राम मनुस्यता के ओह सबसे गहिर अनुभव में रहेलें, जहाँ ना कवनो बोल बा, ना मजहब—सिरिफ एक कोमल छुअन बा, जवन आत्मा के अँजुरी में हरदम पसरल रहेला।

राम आँख में ना, पलुकनी के नीचे बसल रहेलें—वहीं जहाँ लोर जनम लेला आ चुप्पी अपन पहिलका भाषा सिखेला। राम कवनो कहाइल बात में ना, उ अधूरा वाक्य में रहेलें जवन प्रेम कहे के चाहलस, बाकिर हिम्मत बीच राह में चुप हो गइल। राम उ अधूरा बात हउवें—जे पूरा से बढ़ के बा।

राम कवनो मंज़िल ना, उ त अइसन यात्रा हउवें जे थाकल देह में भी उमंग खोज लेला। राम उ आवाज़ हउवें जे आवे के पहिले सुनाई दे जालें, आ जब आवे लें त सगरी भीतर के चुप्पी के आशीर्वाद बना देलें। उ त कवनो तर्क के उत्तर ना, बलुक उ मौन के ओह स्वीकृति हउवें जहाँ तर्क खुद के भुला देला।

जब रात में चनरमा अकेले आकाश में लटकत बा, आ धरती चुपचाप ओकरा निहारत रहेला—त ओह नज़ारे में राम रहेलें। उ देखे आ देखे जाए के बीच के ओह नाजुक पल में बाड़ें, जहाँ प्रेम के ना कवनो बोल के दरकार होला, ना छुअन के।

राम सिरिफ उ ना जे अयोध्या लवटलें, बलुक उ भी हउवें जे कबहूँ ककरो लगे ना पहुँचलें, बाकिर कबहूँ ककरो से दूरो ना भइले। राम प्रतीक्षा में ना, प्रतीक्षा के मिठास में बाड़ें। उ मिलन में ना, ओह विरह के एकांत सुर में बाड़ें, जे रात के आखिरी पहर आत्मा के झकझोर देला।

राम उ माई के आँख में बाड़ें जे आपन लइका ला रोटी सेकतिया, आ उ बुजुर्ग के मन में जे बरसों से एगो दुआर की ओर ताकत रहलें। राम कवनो पुकार से ना जनमलें—उ त पहिले से बाड़ें, आ जब ले श्वास बा, तब ले रहिहें। प्रार्थना त मन के जागरूकता ह, राम त ओकरा पहिले के चेतना हउवें।

राम के कवनो छू ना सकेला, बाकिर उ छुअन से जादे उपस्थित बाड़ें। राम कवनो शीशा में ना लउकस, बाकिर जब आदमी अपना से नजर मिला ला, त उहे राम मिल जालें। उ त उ पल में बाड़ें जब मन आत्मा के सोझा निहुर जाला—बिना वजह, बिना प्रयोजन।

राम के उपस्थिति ओह ठंढा बयार नियर बा—जे लउके ना, बाकिर हर पत्ता के डोलावेला। उ ना त कवनो जीत के कहानी हउवें, ना हार के—उ त ओह सन्नाटा हउवें जे जुद्ध के बाद बचेला, आ एगो नया सुरुआत के जनम देला।

राम के होखल कवनो तथ्य ना, एक अनुभूति ह—जे एगो पवित्र उदासी से शुरू होला आ एगो चिरंतन उजास में समा जाला। राम उ उजास हउवें—न त दीप के लौ, न सूरज के रउशनी—सिरिफ एक भितरी उजियार, जे हरदम साथे रहेला।

राम उ माफी हउवें जे अपराध के पहिले से मन में समा जाला। राम उ करुणा हउवें जे इंसाफ से जादे प्रीतिकर लागेला। राम कवनो धर्म ना, धर्म के आत्मा हउवें—उ आत्मा जे सब मत-मतांतर से ऊपर बा, बाकिर हर दिल में एके नियर बसल बा।

राम कवनो नाम ना, एक अनुभव हउवें। जब कवनो के देख के कहल ना जा सके कि काहें प्रिय लागेला, बाकिर लागेला—त उहे राम हउवें। जब कवनो पल के रोकल ना जा सके, बाकिर उ सदा खातिर स्मृति बन जाला—उहो राम हउवें।

आ अंत में—राम उ मौन हउवें, जे ई सगरी बात पढ़ला के बाद भी बांचत रह जाला। जे शब्द के छोड़ के पाठक के दिल में उतरत बा—बिना बोले, बिना जतावे, बिना माँग के। बस रहेला—जइसे जीवन, जइसे प्रेम, जइसे राम।

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